Leela of Deepawali - Sarvadnya Shree Chakradhar Swami have been the part of 8 Deepawali in Maharashtra

Leela of Deepawali - Sarvadnya Shree Chakradhar Swami have been the part of 8 Deepawali in Maharashtra
🙏 Dandvat Pranam 🙏

As we all know that our fifth avatar of Mahanubhav Pantha; Sarvadnya Shree Chakradhar Swami Ji spent his most of the time in the Maratha and at the age of 80. Lord left to the Badrikashram, Himalaya.
Once Mahadaisa requested the Lord. I wish to celebrate the Deepwali Festival in your service. Lord given the grant and all they started the preparation. Even they need anything, then ask the Nagubaisa.
Everything is ready for the evening bath, they have the Turmeric paste, Oil and Soap all from the Umaisa’s home. At the early morning. Sarvadnya Shree Chakradhar Swami is ready and have taken the assan. Even all the Bhakats have taken their positions. Mahadiase, who requested for the celebration have started. She started with the aarti, then greeted the lord with Beeda(वीड़ा). She started rubbing turmeric over the body of the Lord, then after shared the bowl with the bhagats. The bhagats have rubbed the same material on each other. Then they washed the Lord. Mahadaisa was pouring water and Baisa is rubbing the body. Bhagats were standing beneath and they are also washing them with the same Charan Amrit. In this way, the sanan is done.
Since Nagdev body is hairy, so more water is given to him for the bath. Mahadaise, have done some traditional way arti of Prabhu Ji. Then after Prabhu Ji dressed up and arti, Chandan tilak, Paan-Beeda, Bhog is proposed to the Lord. This way the Pooja avasr have been done. Later the food is processed to all the Bhakats and in this way the Leela of Deepawali happened.
सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी महाराज यांनी, महाराष्ट्रात साजरे केलेले आठ दिवाळी सन। पूर्वार्ध: 🔴 १) पैठण.. शके ११९०, रवि ०७.१०.१२६८
🔴 २) सिन्नर.. शके ११९१, शनि २६.१०.१२६९
🔴 ३) बिड.. शके ११९२, बुध, १५.१०.१२७०
🔴 ४) जालना.. शके ११९३, सोम ०५.१०.१२७१
उत्तरार्ध: 🔴 ५) डोमेग्राम.. शके ११९४, शनि २२.१०.१२७२
🔴 ६) नेवासा.. शके ११९५, बुध ११.१०.१२७३
🔴 ७) पैठण.. शके ११९६, सोम ०१.१०.१२७४
🔴 ८) आंबा [शेकटा].. शके ११९७, रवि २०.१०.१२७५
महात्माओं की दीवाली एक दिन महदाइसाने भगवानसे प्रार्थना की, ‘महाराज ! मैं आपकी सेवामें दीवालीका त्यौहार मनाऊँगी ।’ भगवानने आज्ञा दी, ‘हमारे साथ महात्मालोगोंकी भी दीवाली मनायी जाये । त्यौहार मनानेका सामान यदि कम हो, तो नागुबाइसासे माँग लो ।’
महदाइसाने ‘जो आज्ञा’ कहकर सबको स्नान करानेके लिये संध्याके समय ही पानी भर लिया । उमाइसाके घरसे उबटन, तेल तथा साबुन ले आयी । उस दिन भगवान् बहुत सवेरे उठकर शौच आदिसे निवृत्त होकर आसनपर आ बैठे । भक्तलोगोंको भी बैठाया गया । महदाइसाने भक्त तथा भगवानकी आरती उतारी और भगवानको वीड़ा दिया । महदाइसाने भगवानके शरीरपर उबटन मला । उस कटोरीमें और तेल डालकर उसने भक्तोंको दिया । उन्होंने उबटनसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरका मर्दन किया । उसने भगवानके सिरपर तेलकी मालिश की । भगवानको ऊँचे चबूतरेपर बिठलाया गया । नारियलके दूधसे उनका सिर धोया गया । भक्तजनोंको भी हरे नारियलका दूध सिरमें लगानेको दिया गया । उन्होंने एक-दूसरेके सिरपर मल लिया । फिर भगवानको जलसे नहलाया गया । महदाइसा पानी डाल रही थी और बाइसाजी सिर तथा शरीरको मल रही थी । भक्तलोग चबूतरेके नीचे खड़े होकर उस पानीसे नहा रहे थे । अंतमें जब भगवानकी श्रीमूर्तिपर पानीकी धार डाली गयी, तो भगवानने दोनों हाथ सिरपर रख लिये । पानी कुहनियोंसे होकर बहने लगा । उस पानीसे भक्तजन नहाये । इस प्रकार भगवान् तथा भक्तोंको स्नान करवाया गया ।
शरीरपर बाल अधिक होनेके कारण नागदेवजीको और अलग पानी देकर नहलाया गया । महदाइसाने कुछ वस्तुएँ लेकर भगवानके सिरसे वार दीं । उसके पश्चात भगवानने वस्त्र पहिन लिये । भगवानको आसनपर बिठलाकर उनकी पूजा की गयी । सभीको चंदनका तिलक लगाया गया । पुनश्च सभीके सिरपरसे कुछ वस्तुएँ वार दी गयीं । भगवानको वीड़ा और भक्तजनोंको पान दिये गये । भगवानने सबको पान खानेकी आज्ञा दी । सबने पान खाये । उतनेमें अरुणोदय हो जानेपर बाइसाजीने दैनिक पूजाअवसर किया । बादमें भगवान् विहरणके लिये चले गये और महदाइसा भोजन बनानेमें लग गयी ।
विहरणसे भगवानके लौटनेपर महदाइसाने पूजाअवसर किया । भगवानके लिये थाल और भक्तोंके लिये पत्तलें परोसी गयीं । भगवानके साथ बैठकर सब भक्तजनोंने भोजन किया । इस प्रकार दीपावली मनायी गयी ।
🙏 श्री चक्रधरार्पणम् 🙏

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏

🙏 दंडवत प्रणामनमो पंच कृष्ण अवतार

  • Author: Dandvat
  • Posted on: December 31, 2016 8:00 AM
  • Tags: Mahanubhav Pantha, Shree Chakrdhar Swami, Mahanubahv Tirath Sthan, Panch Krishan Avatar, Mahanubhav Panth Literature, Rituals of Mahanubhav Pantha, Knowing Mahanubhav Pantha

Gyan Shakti Savikar - When Shree Chakarapani Maharaj ji accepted the Gyan Sakti form Shree Dattatreya Prabhu ji
🙏 Dandvat Pranam 🙏

It was the time when Shree Chakarapani Maharaj Ji left to Mahur, it was the Saka 1080 era. At the age of 30; Shree Chakarapani Ji made the pilgrimage to meet Shree Dattatreya Prabhu Ji since the reason behind is to receive the Avatar Shakti from Avadhot Prabhuraya.
People were climbing step by step to the Mahurgarh peak. They all were in a row. Suddenly, the people started making panic, there was a tiger behind them. But Shree Chakarapani Prabhuji fearlessly set himself in front of the tiger, because he knows Shree Dattatreya Prabhuji is in the form of the tiger.
Then Prabhu ji greeted tiger with a namaskar. Then after, The Lord Shree Dattatreya Maharaj Ji blessed him with his toe and given him the Ubhay Shakti (उभय शक्ती) and Shree Chakarapani Ji accepted the Gyan Shakti (ज्ञान शक्ती) and started the work with the Para Shakti (पराशक्ती).
ज्ञान शक्ती स्वीकार इधर श्री चक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से (श्री दत्तात्रेय प्रभु) वाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्री चक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्री चक्रपाणी प्रभु श्री दत्तात्रेय प्रभु के (वाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी वाघने (श्री दत्तात्रेय प्रभु) श्री चक्रपाणी के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की, श्री चक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ “पराशक्ती” के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Bhakti is blessed as per your Karma of previous birth
🙏 Dandvat Pranam 🙏

Even person is great by his Karma not by his Birth.
Lord Shree Krishna in Shree Madbhagwad Geta said that Bhakti is blessed as per your Karma of previous birth. Even person is great by his Karma not by his Birth. Person do known by his nobleness and behavior. We are blessed with the human body such that we can make ourselves get rid of this illusionary world by devoting ourselves to lord without any greed.
Since this world is completely surrounded by the sins and uncertainity. The desire towards the happiness is the dark part of knowledge. To remove this darkest part from each and every mind, In the todays world we all need to spread and cultivate the seed of Shree Madbhagwad Geta. Today we all are too far from the knowledge of Shree Madbhagwad Geta. Due to this, the world is surviving from the chaos, miss conception and the greed. To make the life good and free from all these chaos. We need to devote ourselves completely to Parmeshwra, recite and take in the knowledge from the Shree Madbhagwad Geta and Bharamvidya Shashtra.
There is a well explained sentence from one of the Great Saint of Jai Krishni Pantha “गरुड़ पक्षी आकाश में ऊँचा उड़ता है, परंतु अन्य पक्षी यदि गुरुड़ पक्षी की तरह ऊँचे आकाश में नहीं उड़ सकते है तो क्या बाकि पक्षी उड़ना छोड़ दें ?” So the message is that everybody must try best according to his power, ability and knowledge to promote and serve the Dharma.
श्री कृष्ण भगवान जी ने श्री मदभगवद गीता में कहा है, आप करम करें, करम के फल के विषेय में न सोचें। दुःख – सुख, यश – अपयश, सफलता – असफलता जीवन के अंग है। अर्थार्थ जीवन के साथ साथ सभ चलता रहता है। रात – दिन, सुबह – शाम संसार का एक अनिवार्य भाग है। जो आपके ना चाहने पर भी आप पर पप्रभाब अवश्य छोड़ेंगे। अतः हमे केवल निःसवार्थ भाव पूर्वक करम करना चाहिए।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏