स्वामींचा परिवार
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जय श्री चक्रधर स्वामी जी
स्वामींचा परिवार तीन प्रकार चा होता:
१) दर्शनीय।
२) बोधवंत (ग्यानी पुरूष तथा भक्त)।
३) अनुसरलेला एकून स्वामीचा परिवार १३५ होता। तो येणे प्रमाणे।
भक्त:
१) पैठनची नागुबाई उर्फ बाईसा
२) वरंगलचे माघव भक्त ब्राह्मण।
बोधवंत (ग्यानी पुरूष):
१) श्री नागदेवाचार्य २) शांतबाईसा ३) महादाईसा ४) म्हाइंभट ५) दायंबा
६) देमाईसा ७) छर्दोबा ८) खेईगोई ९) गोईबाई १०) जोनोउपाध्ये
११) नीळभट भांडारेकार १२) नाथोबा १३) चांगदेव भट
अनुसरलेली:
१) भट (नागदेवाचार्य) २) नीळभट ३) शांताबाईसा ४) महादाईसा ५) म्हाइंभट
६) साधा ७) आऊसा ८) आबाईसा ९) नाथोबा १०) पोमाईसा
११) खेईबाईसा १२) गोईबाईसा
दर्शनीय:
१) रामदेव विद्यावंत वडनेतर २) सारंग पंडित ३) इंद्रभट ४) संतोष ५)अवडळभट
६) अवघूत ७) मार्तंड ८) परसनायक ९)प्रद्न्यासागर १०) माइताहरी
११)घुईनायक १२) रेनाईक १३) गदोनायक १४) पद्मनाभी १५) नागदेव उपाध्ये
१६)राके लक्छमींद्रभट १७) काकोस १८)आनो १९) खळो २०) गोंदो
२१) जपिय विष्णुभट २२) भ्रिंगी २३) वैजोबा २४) काळदासभट २५)वामन
२६) मतिविळासभट २७) नागनायक (डोमेग्राम) २८) भाईदेव २९) उपासनीये ३०) काळबोटे
३१) साईदेव ३२) कान्हो उपाध्ये ३३) काळेवासनायक ३४) गोरे जानोपाध्ये ३५) एकाईसे दोन
३६) देमाईसा ३७) लखुबाईसा ३८) सोभागा ३९) यल्हाइसा ४०) भूतानंद
४१) सामकोसे ४२) ललीताइसा ४३) एकाविराबाईसा ४४) द्रविळाबाईसा ४५) रत्नमाणिका
४६) आबयो ४७) माळी (वडेगाव) ४८) कमळनायक ४९) राणाइसा (रामदेव विद्यावंताची माता) ५०) तथा रामदेवाची शिष्या राणाइसा
५१) वामदेव पैठणकर ५२) बोनुबाया ५३) मेहकरकर बोनु बाइया ५४) प्रंपच विस्मृति घाटे हरिभट ५५) तिवाडी
५६) तथा त्याची पत्नी ५७) ग्रह सारंगपाणी ५८) तथा त्याची माता ५९) महादेव पाठक ६०) महादेव रावसगावकर
६१) तिकवनायक हिरवळीकर ६२) वायनायक रावसगावकर ६३) राहिया (पाटोदा) ६४) गोविंदस्वामी ६५) सारस्वत भट बीडकर
६६) कनासीचा ब्राह्मण ६७) सिंदुर्जनाचा ब्राह्मण ६८) मोसोपवासिनी ६९) राघवदेव ७०) कुंडी कनहरदेव
७१) महादेवोराजा ७२) पाल्हाडांगिया ७३) कास्त हरिदेव पंडित ७४) गोपाळ पंडित पारधी निरोपनीचे ७५) साळीवाहन
७६) राऊत दोघे ७७) मातंग ७८) देईभट तांबुळ ग्रहनीचे ७९) भोग नारायण माय धुवा ८०) मायधुवा
८१) दाको ८२) गणपत आपयो सराळेकर ८३) सुयराची बाई ८४) गोवारीया ८५) पंचगंगा ब्राह्मण
८६) सुकिये जोगनायक ८७) पाठक ८८) यंत्राकार वासुनायक ८९) भाऊ तिकवनायक ९०) गुर्जर दोन्ही
९१) नागा राऊळ ९२) मुंजिया बहिनी ९३) छायागोपाळीची स्त्री ९४)मार्तंड विहिरीचा ब्राह्मण ९५) पाठक देगाऊबाई
९६) वरंगलकर हंसाबाई ९७) घोगरगावकर बाई ९८) धानाई अळजपुर ९९) रामदरणेयाची माता १००) मुक्ताबीई
१०१) रोहेरीचा ब्राह्मण १०२) भोगनारायण ब्राह्मण १०३) ठाकूर मार्या १०४) मल्ल (जोगवटा दान देणारा) १०५) स्वामींनी ज्याला जोगवटा दिला तो ब्राह्मण
१०६) नारोबा १०७) नांदेड येथील गोरक्छण ब्राह्मण १०८) हेडाऊ (आऊसा जवळील डांगरेस नावाचा कुत्रा स्वामींचा भक्त होता)
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
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Read moreभगवान श्री कृष्ण जी को छप्पन भोग ...
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भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है। इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है। यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है।
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया:
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी। अर्थात् बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे। जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ। भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया।
गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग:
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों। श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी। व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया।
छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं। उस कमल की तीन परतें होती हैं…प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह” और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं। इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।
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Read moreकुम्भार बोला मुझे चौरासी लाख यानि...
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प्रभु श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ बहुत-सी लीलायें की हैं। श्री कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़ते और माखन चुराते और गोपियाँ श्री कृष्ण का उलाहना लेकर यशोदा मैया के पास जातीं। ऐसा बहुत बार हुआ।
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।
भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे। कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि ‘कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।’
तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, कुम्भार! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या?’
कुम्भार ने कह दिया – ‘नहीं, मैया! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।’ श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं। अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं – ‘कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’
कुम्भार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’
कुम्भार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।’
प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।’
अब कुम्भार कहता है – ‘बस, प्रभु जी! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
भगवान बोले – ‘वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो?’
कुम्भार कहने लगा – ‘प्रभु जी! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है। मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’
भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।’
प्रभु बोले – ‘अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’
तब कुम्भार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे। बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।
फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।
।। हरी व्यापक सर्वत्र समाना ।।
।। प्रेम से प्रकट होई मैं जाना ।।
मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता, चाहे कोई कर ल्यो कोटि उपाय।
करोड़ों उपाय भी चाहे कोई कर लो तो प्रभु को प्रेम के बिना कोई पा नहीं सकता।
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Read moreजब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची | उ...
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जय श्री चक्रधर स्वामी जी
जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची तब क्या देखती हैं कि यहां का पानी भी अन्य स्थानों की तरह ही है! कोई विशेष नहीं! बहुत पछतावा कर दादोस के कारण दुखी हो रही थी! मन को समझा कर उन्होंने गंगा में स्नान किया! सबसे पहले दादोस को तिलांजलि दी! फिर अपने परिवार और गोत्र को भी तिलांजलि दी! इसके बाद स्नान कर बाजार आई और अत्यंत दुर्बल नंगे व्यक्ति को भोजन करवाया! उस व्यक्ति को अधिक भूख लगी थी तो वह अतिरिक्त दो लोगों का भोजन भी खा गया! उसके जाने के बाद महादाईसा जी रिद्धपुर के लिए निकली!
यहां से भगवान की ने बाईसा माताजी और नागदेव की को भी परमेश्वर पुर भेजा हुआ था! वे श्री गोविंद प्रभु जी के दर्शन कर वापिस श्री चक्रधर स्वामी जी के पास चलपड़े! भगवान से उन्हें माईतया के घर भेंट हुई!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreउद्धवगीता: दुर्योधन-शकुनी बरोबर द...
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भगवान श्रीकृष्णांनीच दिलेले यथार्थ स्पष्टीकरण:
ऊद्धव हा कृष्णाचा अगदी बालपणापासुनचा मित्र. त्याचा सारथी होणारा, अनेक प्रकारे सेवा करणारा. त्याने श्रीकृष्णापाशी कधीही कोणती इच्छा व्यक्त केली नाही की कोणता वर मागून घेतला नाही. भगवान श्रीकृष्णांचा अवतार संपुष्टात यायच्यावेळी ऊद्धवाला त्यांनी बोलावून घेतले आणि म्हणाले, “प्रिय उद्धवा, या माझ्या अवतारात अनेकांनी माझ्याकडून वर मागून घेतले, पण तू कधी मला काही मागितले नाहीस! मला हा अवतार संपवताना तुलाही काही दिल्याचे समाधान लाभेल. तेव्हा निश्चिंत मनाने मला माग. मी ते पूर्ण करीन.”
लहानपणापासून जवळून पाहिलेल्या श्रीकृष्णाला उद्धवाने यावेळी देखील कोणतीच इच्छा अपेक्षा केली नाही. पण श्रीकृष्णानीच शिकवलेल्या गोष्टी आणि त्याची स्वतःची कृती यातील काही गोष्टी त्याला समजल्या नव्हत्या. त्याबद्दल त्याचे मन साशंक होते आणि ती अस्वस्थता दूर करण्यासाठी त्याला श्रीकृष्णाच्या अशा त्या सर्व कृतींमागची कारणे जाणून घ्यायची इच्छा होती.
उद्धव श्रीकृष्णास म्हणाला, “हे कृष्णा, तु आम्हाला जगण्यासाठी एका मार्गाने शिकवलेस पण तू स्वतः वेगळ्याच मार्गाने जगलास!
महाभारतात तुझ्या भूमिकेतून तू केलेल्या अनेक कृती मला कधीच समजल्या नाहीत! मला त्यामागची कारणे जाणून घ्यायची इच्छा आहे. ही तू माझी इच्छा पूर्ण करशील ?”
भगवान श्रीकृष्ण म्हणाले, “उद्धवा, कुरूक्षेत्रावर मी अर्जुनाला जो उपदेश केला ती भगवत् गीता होती. आज मी तुला जे सांगेन ती ‘उद्धव गीता’ म्हणून ओळखली जाईल. म्हणूनच ही संधी मी तूला देत आहे. अगदी निःशंक मनाने तुझे प्रश्न विचार.”
उद्धवाने विचारण्यास सुरवात केली, “प्रभो, सर्वप्रथम मला हे सांगा, खरा मित्र कोण?”
भगवान श्रीकृष्ण म्हणाले, “खरा मित्र तो असतो जो न सांगता देखील संकटसमयी मदतीला धावून येतो.”
उद्धव: “कृष्णा, तू पांडवांचा जिवलग सखा आहेस. ते तुला त्यांचा आपदबांधव (संकटांपासून संपूर्ण रक्षणकर्ता) समजतात. ज्याला केवळ वर्तमानाचेच नव्हे तर भविष्यात घडणार्या घटनांचे संपूर्ण ज्ञान आहे. तु खरा ज्ञानी आहेस. आत्ताच तू मला खर्या मित्राची व्याख्या सांगितलीस. मग त्याप्रमाणे तू का नाही वागलास? धर्मराज युधिष्ठीरास द्यूत खेळण्यापासून का नाही थांबवलेस? ठीक आहे नाही थांबवलेस पण खेळाचे परिणाम धर्मराजाच्या बाजूने का नाही फिरवलेस? तो जिंकला असता पण तू ते ही नाही केलेस! निदान संपूर्ण सत्ता संपत्ती हरल्यानंतर तरी धर्मराजाला वाचवता आले असते. द्यूतात हरलेल्या धर्मराजाला होणार्या शिक्षेपासून तुला सोडवता आले असते. किंवा त्याच्या भावांना त्याने जेव्हा द्यूतात पणास लावले तेव्हा तरी द्यूतसभेत तू प्रवेश करू शकत होतास. पण तेही तू केले नाहीस!
किमान अशाक्षणी जेव्हा “जर तू द्रौपदी (जिच्यामुळे पांडव नेहमीच यशस्वी होत आले अशी) पणाला लावशील तर हरलेले सर्व राज्य संपत्ती मी तुला परत देईन” या दुर्योधनाने धर्मराजास दिलेल्या प्रलोभनावेळी जरी तू तुझ्या दिव्यशक्तीने हस्तक्षेप केला असतास तरी धर्मराजास विजय प्राप्त करून देणार्या अनुकुल सोंगट्या पडल्या असत्या. याऐवजी, जेव्हा राणी द्रौपदीची अब्रू जाण्याची वेळ आली त्याक्षणाला तू हस्तक्षेप केलास आणि मग दावा करतोस की द्रौपदीला तू वस्त्रे पुरवलीस आणि तिची अब्रू वाचवलीस. हे असं कसं करू शकतोस – जेव्हा तिला भर सभेत ओढत, फरफटत आणलं गेलं आणि भरसभेत अनेकांसमोर विवस्त्र करण्यात आलं? काय तिची अब्रू शिल्लक राहीली होती ? काय तू नक्की वाचंवलस ? संकटसमयी वाचवशील तेव्हाच खरा तू आपदबांधव! संकटसमयी तू धावून नाही आलास तर काय उपयोग ? हा धर्म आहे का?”
एकामागोमाग प्रश्न विचारत असताना उद्धवाच्या डोळ्यातून अश्रूधारा वाहू लागल्या…
हे सर्व प्रश्न केवळ उद्धवाचेच नव्हते. ज्यांनी महाभारत वाचले आहे त्याआपल्या सर्वांचे आहेत. जणू काही आपल्या वतीनेच उद्धवाने ते भगवान श्रीकृष्णास विचारून ठेवले होते.
भगवान श्रीकृष्ण हसले, “प्रिय उद्धवा, या भूतलावरील मानवी जगाचा नियम आहे : केवळ विवेकबुद्धी जागृत असणार्याचाच विजय होतो. दुर्योधनाकडे ती विवेकबुद्धी त्यावेळी होती पण धर्मराजास ती सोडून गेली होती. आणि म्हणूनच धर्मराज युधिष्ठिर हरला.”
भगवान श्रीकृष्णाचे बोल उद्धवास उमगले नाहीत आणि तो संभ्रमात पडला.
श्रीकृष्ण पुढे म्हणाले, ” दुर्योधन अमाप संपत्तीचा मालक होता पण द्यूत खेळण्याचे ज्ञान मात्र त्याच्यापाशी नव्हते. म्हणून त्याने मामा शकुनीस द्यूत खेळण्यास वापरले पण खेळातील पैजा त्यानी लावल्या. हा विवेक आहे.
धर्मराज युधिष्ठिर देखील हा विचार करून तसे करू शकत होता आणि मला, त्याच्या बंधूला त्याचा प्रतिनिधी म्हणून खेळवू शकत होता. जर मी आणि शकुनी द्यूत खेळलो असतो, तर या खेळात तुझ्यामते कोण जिंकलं असतं? मी विचारलेल्या संख्या शकुनीला पाडता आल्या असता की त्यानी सांगितलेल्या संख्या मला पाडता आल्या नसत्या ? तूर्त ही गोष्ट बाजूला ठेव.
धर्मराजाने एकवेळ मला खेळात आमंत्रित करण्याचं विसरला असता तर ती चूक पण मी दुर्लक्षित केली असती. पण विवेकशून्य आचरणात त्याच्या हातून एक गंभीर चूक घडली. धर्मराज युधिष्ठिराने प्रार्थना केली की मी द्यूतसभेत येऊ नये ! कारण त्याला मला हे कळू द्यायचे नव्हते की केवळ दुर्दैव म्हणून तो या खेळात ओढला गेला होता आणि तो खेळणे त्याला भाग होते. त्यानी मला केलेल्या या प्रार्थनेमुळे माझे हात बांधले गेले. मी सभेच्या बाहेरच उपस्थित होऊन प्रतिक्षा करत होतो की पांडवांपैकी एकजण तरी प्रार्थना करून मला बोलावेल. भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव हे देखील जेव्हा हरले तेव्हा दुर्योधनाला शिव्याशाप आणि स्वतःच्या नशिबाला दोष देण्यात मग्न झाले होते. मला बोलवायला ते विसरले होते. द्रौपदीदेखील मला विसरली होती जेव्हा मोठ्या भावाची आज्ञा म्हणून दुःशासनाने तिला केसांना धरून भर सभेत फरफटत आणले. ती सुद्धा तिच्या बुद्धीप्रमाणे सभेत सर्वांशी वादविवाद घालत होती. त्या क्षणापर्यंत तिने एकदाही मला बोलावले नाही.
अखेर तेव्हा सुबुद्धी निर्माण झाली जेव्हा दुःशासनाने तिला एकेक कपड्यानिशी विवस्त्र करायला सुरवात केली. सर्व विरोध थांबवून तिने अखेर हात टेकले आणि आक्रोश करायला सुरवात केली. “हरी! हरी! अभयम् कृष्णा अभयम्” असा टाहो फोडत माझी प्रार्थना केली.
आणि त्याक्षणी तिची अब्रू वाचवण्याची संधी मला मिळाली. शक्य तितक्या जलद मी पोहोचून तिचे रक्षण केले. या सर्व परिस्थितीत माझी काय चूक आहे सांग बरे?”
“काय छान समजावलेस कृष्णा! मी प्रभावित झालो! पण नक्कीच फसलो नाही. एक अजून प्रश्न विचारू शकतो ?” श्रीकृष्णानी संमती दिली.
“याचा अर्थ असा आहे का की जेव्हा तुला बोलावलं जाईल तेव्हाच तू येणार? संकटसमयी न्याय प्रस्थापित करण्यासाठी तू स्वतः येणार नाहीस. बरोबर ?” उद्धवाने पुढील प्रश्न विचारला.
भगवान श्रीकृष्णांनी स्मित केले, “उद्धवा! या मनुष्यजन्मात प्रत्येकाचे आयुष्य हे ज्याच्या त्याच्या कर्मानुसार पुढे जाते. मी चालवत नाही ते. मी त्यात ढवळाढवळ करीत नाही. फक्त ‘साक्षीदार’ म्हणून मी उपस्थित असतो. मी सदैव तुझ्या जवळच असतो आणि जे काही घडत आहे ते पहात असतो. हा परमेश्वराचा धर्म आहे.’
“वाह! खुपच छान कृष्णा! म्हणजे तू आमच्या जवळच रहाणार, आणि जसजसे करत जाऊ तसतशी आमची दुष्कर्म पापं करताना पहात रहाणार. आम्ही अशाच चुका करत रहावं पापं करत रहावं आणि त्यांची शिक्षा भोगत रहावं हे तुला आमच्याकडून हवं आहे ?”
भगवान श्रीकृष्ण म्हणाले, “उद्धवा ! तु जे काही बोललास, जी विधानं केलीस त्याचा नीट खोलवर विचार कर. जेव्हा तुला हे लक्षात आलं आहे आणि पक्कं समजलं आहे की मी सदैव तुझ्या बाजूलाच साक्षीदार म्हणून उभा असतो तेव्हा तुझ्या हातून चूक किंवा वाईट कृती घडेलच कशी? निश्चितच तू असं काही करणार नाही. पण जेव्हा ही गोष्ट विसरली जाते तेव्हा माझ्यापासून लपवून एखादी गोष्ट करता येईल असा विचार तुझ्या मनात येतो. आणि अशावेळी तू संकटात सापडतोस. जर धर्मराजाच्या हे लक्षात राहिलं असतं की मी सदैव सर्वांसमवेत सर्वठिकाणी साक्षीरूपाने हजर असतो तर तो खेळ वेगळ्या परिणामांनी संपुष्टात नसता का आला ?”
उद्धव आता थक्क होऊन स्तब्ध झाला होता आणि त्याचं मन अपार भक्तीनी भरून वहात होतं. तो म्हणाला, “किती खोल आहे हे तत्त्वज्ञान ! किती श्रेष्ठ सत्य ! देवाची पूजा प्रार्थना करणं आणि त्याची मदत मागणं ही केवळ आपली भावना, श्रद्धा असते. ज्याक्षणापासून आपण हा विश्वास ठेवायला लागतो की त्याच्याशिवाय काही चालू शकत नाही तेव्हा त्याचं साक्षीरूप अस्तित्व जाणवल्याशिवाय रहाणार नाही. हे विसरून कोणतीही कृती आपल्या हातून घडणे शक्य आहे का ? संपूर्ण भगवदगीतेतून हेच तत्त्वज्ञान भगवान श्रीकृष्णांकडून अर्जुनास प्राप्त झाले आहे. श्रीकृष्ण सारथी होता मार्गदर्शक होता पण तो स्वतः लढला नाही.
जाणावा तो अद्वितीय एकमेव परमोच्च साक्षी आपल्या आतला आणि आपल्याविना! आणि त्या परमेश्वर तत्त्वाशी एकरूप समरूप होऊन जा.
शोधा आणि पहा अंतरंगातला तो उच्च मी ..केवळ शुद्ध, प्रेमपूर्ण, आनंदपूर्ण नामस्मरणाने ती परमोच्च जाणीव ”
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान जी प्रातः काल का पूजा अवसर हो जाने के बाद छिन्नस्थली विहरण के लिए गए! वहां से सिंह नारायण के मंदिर में आकर आसन पर बैठे! इतने में ही इन्द्रभट्ट आए और सम्मुख बैठ गए! उन्हें भोजन के लिए नियंत्रण देना था किंतु याद ही नहीं रहा! आसमान में बादल देखते ही महाराज ने संकेत किया कि इन्द्रभट्ट तुम शीघ्र अपने घोगर गांव चले जाओ अन्यथा भीग जाओगे!
इन्द्रभट्ट बचते हुए जैसे ही गांव पहुंचे वैसे ही बारिश शुरू हो गई! इधर भक्तजन कपड़े का चंदोवा बना कर भगवान जी के ऊपर लगा चलने लगे! कभी जानबूझ कर लीला के हेतु से महाराज पीछे रह जाते तो कभी आगे निकल आते! जब तक भक्तजन चांदोवा आगे पीछे करते तब तक महाराज भीग जाते! इस प्रकार उनके वस्त्र गीले देख रेइनायक के घर से दूसरे वस्त्र मंगवाए गए! सभी भक्तों ने भी राजमठ वापिस लौट कर दूसरे वस्त्र धारण किए!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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