दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमान...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
🌸 दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमाने संपुर्ण शरणागती
🌸 दंडवत हा शब्द प्राचीन ग्रंथ रचनेत सुद्धा आला आहे
🌸 दंडवत दोन प्रकारे केल्या जातो ,एक वाचिके कायाप्रणीत कंबरेपासुन वाकुन दंडवत बोलने
🌸 दुसरा दंडवत संपुर्ण शरीर जमीनीवर काठिवत् टाकने
🌸 लीळाचरीत्रात बाईसा राशी दंडवत् घालत होत्या स्वामींच्या दर्शनाला आलेले भक्तजन पाच दंडवत घालुन श्रीचरणी लागत, स्वामी चांगदेव भटाला रिद्दपुरला गेल्यावर घाला घाला दंडवत म्हटले
🌸 आपण सुद्दा स्थानाला गेल्यावर प्रथम बाहेर पाच दंडवत घालुन त्या स्थानाची लीळा आठवावी,नंतर हात सोवळे करुण स्थान वंदन करावे पुनश्च संपुर्ण विधी झाल्यावर दंडवत घालुन मंदिराच्या बाहेर पडावे
🌸 दंडवत घातल्याने जीव स्वरुपी आलेला आसळगै ,पातलेपणा निघुन जातो व साधक विधी करण्यास दक्ष होतो
🌸 दंडवताने रोग नाहिसे होतात ,कारण दंडवत हा एक ऊत्तम व्यायाम आहे,वाय,कफ,पित्त बाधत नाहित
🌸 दंडवत घालताना लीळाचरीत्रातील दंडवताच्या लिळा आठवल्याने जीव स्वरुपाची योग्यता वाढते ईत्यादि अनेक फायदे आहेत
🌸 परमेश्वराच्या सर्व साधकाने एकमेकांना भेटल्यावर वाकुन ,नम्रतेने ,श्रद्धेने आवडिने दंडवत केला तर स्वामी भेटलेयाचे गोमटे होते
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreपञ्च कृष्ण अवतारों के स्मरण के बा...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
चक्रधर स्वामीजी ने कहा इसी प्रकार पञ्च कृष्ण अवतारों के स्मरण के बाद अपने अपने गुरु निमित की भी याद करनी चाहिए
# वेध गुरु,
# उपदेश गुरु,
# बोध गुरु,
# शाश्त्र उद्देश्य गुरु,
# दीक्षा देत गुरु,
एव अनेक प्रकार के गुरु निमितों को याद करना चाहिए और दंडवत डालनी चाहिए।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreलाहीभट्टकी श्रवणजिज्ञासा
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन लाहीभट्ट श्रीचक्रधर स्वामीजीके दर्शनोंको आया। प्रणाम करनेके उपरांत उसने भगवानसे कुछ सुननेकी प्रार्थना की। भगवान बोले, ' लाहीभट्ट, अपने मनमें धारण किये देवताविषयक सकाम कर्मोंको भुला देनेपर ही तुम हमारे उपदेशके वास्तविक अधिकारी बन सकते हो। उनके रहते ईश्वरीय ज्ञानकी प्राप्ति दुर्लभ है।'
लाहीभट्ट बोला, 'महाराज! देवताभक्त ईश्वरीय ज्ञानको धारण क्यों नही कर सकता ? उसमें भी तो कर्मकांड पर अटूट श्रद्धा रहती है।'
भगवानने समझाते हुए कहा, 'भट्ट! कोरा कर्मकांड मुक्ति नहीं दिला सकता। उससे तो केवल देवताओंके सुखफल ही प्राप्त हो सकते हैं। ईश्वरीय ज्ञानके लिये तो मनुष्यको एकनिष्ठ होना परम आवश्यक है ; क्योंकि जैसे एक मनुष्यके ठहरने पर उस स्थान पर दूसरा मनुष्य नहीं ठहर सकता, वैसे ही देवताविषयक अथवा सांसारिक कामनाओंसे ठसाठस भरे हुए हृदयमें ईश्वरीय ज्ञान चिरंतन कालतक ठहर नहीं सकता।'
सूत्र : वि. बाइः बिढारावरि काइ बिढारु असे ।।२६४ ।।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
जय चक्रपाणि महाराज जी
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreहमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)
|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)
|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)
|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)
|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreकुम्भार बोला मुझे चौरासी लाख यानि...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
प्रभु श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ बहुत-सी लीलायें की हैं। श्री कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़ते और माखन चुराते और गोपियाँ श्री कृष्ण का उलाहना लेकर यशोदा मैया के पास जातीं। ऐसा बहुत बार हुआ।
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।
भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे। कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि ‘कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।’
तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, कुम्भार! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या?’
कुम्भार ने कह दिया – ‘नहीं, मैया! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।’ श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं। अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं – ‘कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’
कुम्भार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’
कुम्भार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।’
प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।’
अब कुम्भार कहता है – ‘बस, प्रभु जी! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
भगवान बोले – ‘वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो?’
कुम्भार कहने लगा – ‘प्रभु जी! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है। मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’
भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।’
प्रभु बोले – ‘अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’
तब कुम्भार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे। बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।
फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।
।। हरी व्यापक सर्वत्र समाना ।।
।। प्रेम से प्रकट होई मैं जाना ।।
मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता, चाहे कोई कर ल्यो कोटि उपाय।
करोड़ों उपाय भी चाहे कोई कर लो तो प्रभु को प्रेम के बिना कोई पा नहीं सकता।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreश्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष:
१) रूषी वेष
२) बाल वेष
३) मातंग वेष
४) ब्राम्हण वेष
५) गोंधळी वेष
६) कुष्टी वेष
७) व्याघ्र वेष
८) अवधुत वेष
९) पारधी वेष
१०) दिगंबर वेष
शकोणत्या वेषाने कोणाला भेट दिली:
१) रूषी वेष – सहस्त्रार्जुन
२) बालवेष – अनुसूया , पार्वती , लक्ष्मी ,सावित्री
३) मातंग वेष – अर्ळक राजा
४) ब्राह्मण वेष – रेणुकेचा निक्षेप करते वेळेसपरशुरामाला
५) गोंधळी वेष- डखले , चांगदेवभट
६) कुष्टी वेष – सप्त रूषी
७) व्याघ्र वेष – चक्रपाणि महाराज
८) अवधुत वेष – यदुराजा , मदाळसाराणी
९) पारधी वेष – परशुराम
१०) दिगंबर वेष – शंकराचार्य
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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