जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची | उत्तरार्ध लीला क्रमांक 201 | लीला चरित्र

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-12-10 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1702211400

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

म्हाइंमभट्ट जी का अहंभाव दूर करना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री गोविंद प्रभु राया
एकदिन म्हाइंभट्ट जी ने सर्वज्ञ श्री गोविंद प्रभु जी के लिए अच्छा उपहार तैयार करवाया। तैल मर्दन, स्नानादि क्रियाके पश्चात श्रीप्रभु सर्वज्ञ को बहुमूल्य वस्त्र पहनाया गया। प्रसन्नतावश उस किमती बहुमूल्य वस्त्रको पहने सर्वज्ञ आनंदसे आगनमें इधर-उधर घुम रहे थे, तो सर्वज्ञ श्रीगोविंदप्रभुबाबाकी प्रसन्नता देखकर *म्हाइंमभट्टजीको अहंभाव जागृत हो उठा की यह मैं ही म्हाइंमभट्ट हूं, जीसका इतना बहुमूल्य किमती वस्त्र श्रीप्रभुबाबा स्वीकार कर रहे है !!! घट घटके जाननहार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे भला म्हाइंमभट्टके मनमें जागृत हुई इस अहंभावना कैसे छुपी रह सकती। उसे जान तत्काल उस वस्त्र उतार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबाने दूसरा वस्त्र पहन लिया, और उस वस्त्र पर पाद प्रहार कर बोले- अरे पगले व्यर्थमें ही इसकी बड़ाई कर रहा है! इसे अभी हम फाड देंगे!' कहकर उस वस्त्रको इधर-उधर घसीटने लगे। उस समय श्रीसर्वज्ञके सन्मुख जानेकी कीसी को हिम्मत नहीं हो रही थी जिससे उन्हें विनंतीकी जाय।

तब श्रीआचार्यजीने म्हाइंमभट्ट जी से पूछा, ' म्हाइंमभट्ट! क्या तुमने मनमें कोई कल्पना तो नहीं की ?' उत्तरमें म्हाइंमभट्टजी बोले, 'हां ! आचार्य! मैंने वस्त्र के संबंधमें कल्पना कर संतोष अनुभव कर रहा था।

आचार्यजी समझाते हुए बोले, 'भट्टजी, हम जीवोंके पास है ही क्या, जो हम परमेश्वरको समर्पित कर सकें? तुमने किया ही क्या था? की मनमें इतना संतोष मान बैठे? अब सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते नमस्कार डालीये !!!!!।

तब म्हाइंमभट्टजीने साष्टांग नमस्कार डालते आर्तभरे स्वरमें सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते प्रार्थना करते विनंती की- 'हे भगवन् मैं अपराधी हूं, मैंने अहंभाववश मनमें व्यर्थकी कल्पना की थी, मेरे इस अपराधके लिए मुझे क्षमा किजीये श्रीप्रभु राया। आपके सम्मुख वह वस्त्र है ही क्या? किंतु! अज्ञानतावश मैं यह जान ही न सका। मेरी यह अबुधताके लिए मुझे क्षमा किजिए !!!!!' यह कहकर वे रो पडे तो करुणाधन सर्वज्ञ श्रीप्रभु राया का दिल पसीज उठा। प्रसन्न होकर श्रीराया बोले,' अरे पगले! उठ जा ! उठ जा, जल्दी, क्यों नहीं उठ रहा ! पगले! अब तो तुम मेरे और भी अधिक प्रिय बन गये हो!

म्हाइंमभट्टजी उठकर वह वस्त्र ले आये तो सर्वज्ञ श्रीप्रभुरायाने उसको पुनः पहन लिया। कुछ दिनोंतक श्रीप्रभुबाबाके पहननेके पश्चात म्हाइंमभट्टजीने उस वस्त्र को धोनेके लिए दे दिया। उसके पश्चात सर्वज्ञ श्रीप्रभुराया उस वस्त्रको प्रतिदिन पहनते ही रहे।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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वज्री की लीला

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
बेलापुर के आदित्य मंदिर का आँगन। प्रातःकाल का समय। महदाइसा को कुछ घिसने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। उत्सुकता से भर वह बाहर आकर देखती है।

क्या देखती है कि सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी दोनों श्रीचरणों में टिकाए एक पत्थर पर एक काले रंग की ईंट (वज्री) को घिस रहे हैं। अपने उत्तरीय से वे अपना शीर्ष ढंके हुए हैं। अंगिए की बाँहें उन्होंने ऊपर की हुई हैं।

कुतूहल से भर महदाइसा निकट आ खड़ी होती है। चुपचाप। स्वामीजी व्यस्त हैं। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं। सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही हैं।

महदाइसा को कुछ समझ नहीं आती कि स्वामीजी क्या कर रहे हैं? वह जाती है और जाकर नागदेव को बुला लाती है।

कुछ घिस जाने पर स्वामीजी उस वज्री को उलटपलट कर देखते हैं। सही हो गई कि नहीं? सही न पा उसे फिर घिसने लगते हैं।

जब महदाइसा-नागदेव को कुछ समझ नहीं पड़ा तो उनसे रहा नहीं गया। महदाइसा ने तन्मयता भंग करते पूछ ही लिया, 'जी जी: यह आप क्या कर रहे हैं?' पीछे मुड़ स्वामीजी बोले, 'बाई, यह हमने एक वज्री गढ़ी है!

वज्री अर्थात् वारितुरंग। जल में तैरनेवाला घोड़ा, जो पानी से घिरे द्वीप में रहता है और उसमें तैर लेता है। डूबता नहीं। उसे वारितुरंग कहते हैं। उसी की तरह हमने अपने हाथों यह वज्री गढ़ी है। यह सदा पानी में तैरती रहेगी। कभी डूबेगी नहीं।

यह कहते स्वामीजी ने वह वज्री सामने करते दोनों को दिखाई

बरसों बाद महदाइसा ने इसी अनुपम लीला का स्मरण करतेकरते नौगाँव में अपने अंतिम श्वास छोड़े।

ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस लीला का नित्य स्मरण जीव को अवश्यमेव इस संसार-सागर से पार करा देता है। जन्ममरण के चक्र से मुक्त करा देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल के स्मरण में इस फलदायक लीला को अवश्य अपने ध्यान में लाएँ।

सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी की सदा ही जय हो!
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

🌸 बिना भाग्य जो वस्तु ईश्वर अवतार देते है वह लिला ज्ञान कहलाता है।
🌸 अवतार के सम्बन्ध से जो फल प्राप्त होता है वह सम्बन्धदान है।
🌸 जोवो के कर्मों को ग्रहण कर उन्हे सीघ्रता से भुगवाने को ग्रहणा दान कहते है।
🌸 ईश्वर स्वरूप की प्राप्ती होना यह कैवल्यदान कहलाता है।

ईस प्रकार ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के दान दिये जाते है।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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हमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)

|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)

|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)

|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)

|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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एक दिन महदाइसा ने श्री चकर्धर स्व...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी जी ने उत्तर दिया, महदाइसा! जब भगवन श्री कृष्ण जी राजा कंस का वध करके कारागर की ओर जाने लगे तो वहा देखा की उद्धव देव भयभीत स्तम्भ के पीछे खड़े थे।
श्री कृष्ण जी ने उन्हें छिपा देख कर कहा, अरे! वहा कूँ खड़ा है। उतर देते हुए अन्य सेवक ने कहा। प्रभु जी वहा पर राजा कंस के प्रधान मंत्री है। तत्काल उद्धव ने कहा, प्रभु जी में अपनी बुद्धि से कुछ मंत्रणा कंस के समुख रखा करता था। तब प्रभु जी ने कहा, आपने आजतक कंस का अमात्यतव सवीकारा था, अब आजसे आप हमारा मंत्रितब धारण करो ओर हमे मंत्रणा दिया करो।
प्रभु जी के इन्ही वचनों के साथ उद्धव देव को प्रेम संक्रमण हुआ ओर उन्होंने प्रभु जी को सहस्तांग दंडवत प्रणाम कर, खुदको धन्य माना|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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उत्तरार्ध लीला क्रमांक 206 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
किसी दिन सुबह का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी छिन्नस्थली स्थान की तरफ गए! गुफा में आकर महाराज ने नाथोबा और नागदेव जी के सिर आपस में मिला दिए और स्थिति सुख अनुभव करवाया! स्वयं वापिस लौट आए तो बाईसा माताजी ने उन दोनों के विषय में पूछा! तब भगवान जी ने कहा, वे दोनों आपस में भिड़े हुए हैं! जाओ उन्हें ले आओ! बाईसा माताजी नाथोबा और नागदेव जी को बुला लाई! उन दोनों ने आकर स्थिति सुख का आनंद लेने के विषय में भगवान जी को बताया! स्वामी जी कहने लगे, अभी तो हमसे प्राप्त हुआ स्थिति सुख आपको इतना आनंद दे रहा है तो सोचो हमारा परमानंद आपको कितना प्रफुल्लित करेगा! इसका आपको आभास भी नहीं है!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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