प्रातः काल का पूजा अवसर हो जाने के बाद छिन्नस्थली विहरण | उत्तरार्ध लीला क्रमांक 203 | लीला चरित्

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-12-24 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1703421000

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

ज्ञान परम्परा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?

स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।

सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।

श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी महाराज...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

पूर्वार्ध:-
🌸 १) पैठण.. शके ११९०, रवि ०७.१०.१२६८
🌸 २) सिन्नर.. शके ११९१, शनि २६.१०.१२६९
🌸 ३) बिड.. शके ११९२, बुध, १५.१०.१२७०
🌸 ४) जालना.. शके ११९३, सोम ०५.१०.१२७१

उत्तरार्ध:-
🌸 ५) डोमेग्राम.. शके ११९४, शनि २२.१०.१२७२
🌸 ६) नेवासा.. शके ११९५, बुध ११.१०.१२७३
🌸 ७) पैठण.. शके ११९६, सोम ०१.१०.१२७४
🌸 ८) आंबा [शेकटा].. शके ११९७, रवि २०.१०.१२७५

महात्माओं की दीवाली:-
एक दिन महदाइसाने भगवानसे प्रार्थना की, ‘महाराज ! मैं आपकी सेवामें दीवालीका त्यौहार मनाऊँगी।’ भगवानने आज्ञा दी, ‘हमारे साथ महात्मालोगोंकी भी दीवाली मनायी जाये। त्यौहार मनानेका सामान यदि कम हो, तो नागुबाइसासे माँग लो।’

महदाइसाने ‘जो आज्ञा’ कहकर सबको स्नान करानेके लिये संध्याके समय ही पानी भर लिया। उमाइसाके घरसे उबटन, तेल तथा साबुन ले आयी। उस दिन भगवान बहुत सवेरे उठकर शौच आदिसे निवृत्त होकर आसनपर आ बैठे। भक्तलोगोंको भी बैठाया गया। महदाइसाने भक्त तथा भगवानकी आरती उतारी और भगवानको वीड़ा दिया। महदाइसाने भगवानके शरीरपर उबटन मला। उस कटोरीमें और तेल डालकर उसने भक्तोंको दिया। उन्होंने उबटनसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरका मर्दन किया। उसने भगवानके सिरपर तेलकी मालिश की। भगवानको ऊँचे चबूतरेपर बिठलाया गया। नारियलके दूधसे उनका सिर धोया गया। भक्तजनोंको भी हरे नारियलका दूध सिरमें लगानेको दिया गया। उन्होंने एक-दूसरेके सिरपर मल लिया। फिर भगवानको जलसे नहलाया गया। महदाइसा पानी डाल रही थी और बाइसाजी सिर तथा शरीरको मल रही थी। भक्तलोग चबूतरेके नीचे खड़े होकर उस पानीसे नहा रहे थे। अंतमें जब भगवानकी श्रीमूर्तिपर पानीकी धार डाली गयी, तो भगवानने दोनों हाथ सिरपर रख लिये। पानी कुहनियोंसे होकर बहने लगा। उस पानीसे भक्तजन नहाये। इस प्रकार भगवान तथा भक्तोंको स्नान करवाया गया ।

शरीरपर बाल अधिक होनेके कारण नागदेवजीको और अलग पानी देकर नहलाया गया। महदाइसाने कुछ वस्तुएँ लेकर भगवानके सिरसे वार दीं। उसके पश्चात भगवानने वस्त्र पहिन लिये। भगवानको आसनपर बिठलाकर उनकी पूजा की गयी। सभीको चंदनका तिलक लगाया गया। पुनश्च सभीके सिरपरसे कुछ वस्तुएँ वार दी गयीं। भगवानको वीड़ा और भक्तजनोंको पान दिये गये। भगवानने सबको पान खानेकी आज्ञा दी। सबने पान खाये। उतनेमें अरुणोदय हो जानेपर बाइसाजीने दैनिक पूजाअवसर किया। बादमें भगवान विहरणके लिये चले गये और महदाइसा भोजन बनानेमें लग गयी ।

विहरणसे भगवानके लौटनेपर महदाइसाने पूजाअवसर किया। भगवानके लिये थाल और भक्तोंके लिये पत्तलें परोसी गयीं। भगवानके साथ बैठकर सब भक्तजनोंने भोजन किया। इस प्रकार दीपावली मनायी गयी ।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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केशववीहीरी उद्यापनी सातरा आरोगणा:...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

ऋद्धपुर च्या पुर्वेला तिवसा रोडवर असलेली श्री गोविंद प्रभुं चरणांकित, ही विहिर सासु, सुनेची विहिर म्हणून प्रसिद्ध आहे.
लिळा : नगराच्या पूर्वेस केशवनायकांनी विहिर खोदली. परंतु पाणी लागत नाही म्हणुन चिंतित झाले. मग श्रीप्रभु बाबांना विनंती केली, “ बाबा मी खुप कष्टाने विहिर खोदली परंतु पाणी लागत नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, “अवो मेला जाए, वीहीरी खणावी म्हणे : न खणावी म्हणे : मेला जाए खणावीची म्हणे :” तेंव्हा केशव नायक म्हणाले, “जी,जी एव्हडी खोल विहिर खोदली परंतु पाणी लागले नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, अवो मेला जाए खण म्हणे : आणि श्री चरणाचा अंगठा लावला. केशवनायकांनी थोडे खोदताच, खुप पाणी लागले. संपुर्ण विहिर पाण्याने भरली. सर्वजन आश्चर्यचकित झाले.
नंतर केशवनायकांनी सुंदर चिरेबंदी विहिर बांधली. आता फक्त वरील काठ बांधणे बाकी होते. तेंव्हा श्रीप्रभु म्हणाले, “मेला जाए, सीसवठी न बांधता, अगोदर उद्यापन कर म्हणे :” केशव नायक म्हणाले, ज्याअर्थी गोसावी म्हणतात तेंव्हा पुढे काही तरी कठीन प्रसंग असेल ! म्हणून उद्यापण करवित असतील. मग केशव नायकांनी उद्यापऩाची तयारी केली. माडव घातला, ब्राम्हण बोलावले, हवण केले, ब्राम्हणाला जेउ घातले. नंतर गोसावी तेथे बीजे केले, विहीरीमधे एका ठिकाणी बसुन आरोगणा झाली.
इकडे त्याच दिवसी कटक देवगीरीला विठ्ठलनायक व दाएनायकांना, जे राज दरबारा मधे दरबारी होते तृटी आली म्हणून पकडले. केशवनायक त्यांचे व्याही होते, व त्यांनी काही वस्तू केशवनायकां कडे ठेवली होती. म्हणून केशवनायक ही नागवले गेले. तेंव्हा केशवनायक म्हणाले, “राउळांनी येणा-या संकटाची सुचना म्हणून उद्यापण करविले..! [ऋ.च. १५५]

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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कामाख्या के निमित्त देह त्यागना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रपाणि प्रभु जी
कौलि नामक ग्राम में एक हट योगिनी रहा करती थी जिसका नाम था कामाख्या, उसने अपने सौन्दर्य तथा अपने हाव् भाव से अनेक साधु संतो को अपने तप मार्ग से प्रवृत्त किया था। श्री चक्रपाणि महाराज जी के सामर्थ की परिस्थिति सुन बह भी वह आ पहुंची। अपने रंग रूप और हाव् भाव से वो प्रभु जी पर डोरे डालने लगी। श्री चक्रपाणि महाराज जी ने ब्रह्मचर्य धारण किआ था और प्रभु जी अपनी गुफा में ही ध्यान लगाए बैठे थे। कामाख्या गुफा में प्रवेश करना चाहती थी परन्तु बह प्रभु जी द्वारा श्री दत्तात्रय प्रभु जी की दी हुई कसम के कारन अंदर ना जा सकी।
कामाख्या गुफा के भर से ही अनेक प्रकार की स्तुति और प्राथना करती रही और अपने हाव् भाव से कोशिश करती रही परन्तु कोई भी प्रभु जी असर न पड़ा और बह अपने मार्ग से हुए। इसी प्रकार ७ दिन बिट गए और कामाख्या गुफा के दरवार में बैठी रही। अंत में श्री चक्रपाणि जी ने योग सामर्थ्य से अपना देह त्याग दिया। सातवे दिन कामाख्या ने गुफा में प्रवेश किआ तो देखा की प्रभु जी अपना शरीर छोड़ चुके थे। प्रभु जी की प्रसंशा करते हुए उसने खा की अनेक प्रकार के महा पुरषो को अपने वश करा मेने किन्तु प्रभु जी सामर्थ्यवान थे अंत अपने शरीर का त्याग किया।
।। जय श्री चक्रपाणि महाराज जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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सिंह नारायण मंदिर के दक्षिणी भाग ...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
अगले दिन जब भगवान जी पूजा अवसर हो जाने के बाद विहरण के लिए छिन्नस्थली गए तो वहां सिंह नारायण मंदिर के दक्षिणी भाग में पीपल वृक्ष के नीचे आसनस्थ हुए! कुछ समय हो जाने के बाद बाईसा माताजी ने भोजन के लिए आवाज लगाई तो स्वामी जो ने कहा, बाई यह पेट कुछ मांग नहीं रहा है!

इतने में मार्तंड को कहा कि मंदिर की छत पर चढ़कर दूर से आ रहे व्यक्तियों के विषय में बताएं! मार्तंड ने देखा कि इन्द्रभट्ट अपने सिर पर बहुत बड़ा टोकरा रखे बढ़ रहे हैं और साथ में द्वारावती से आए ब्रह्मचारिदेव नाम का ब्राह्मण भी है! भगवान जी की आज्ञा पाकर मार्तंड दौड़ते हुए इन्द्रभट्ट के सिर से टकरा उतारने लगे और स्वयं भोजन उठा कर ले आए! उस दिन इन्द्रभट्ट के घर श्राद्ध था! इनका विश्वास था कि भगवान जी के प्रति भोजन समर्पित करने से सब चरितार्थ हो जाता है! यहां ही सभी तीर्थ स्थान हैं! भगवान जी ने भी उनके भाग्य की बढ़ाई की!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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सबको अपने जैसा जानो

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
नियमानुसार एक दिन आश्रमकी देखभाल आउसा कर रही थी। एक कुत्तेको आया देखकर उसने उसे पत्थर मारा। पत्थर लगते ही कुत्ता चिल्लाता हुआ पूँछ दबाकर बाहरकी ओर भाग गया। कुत्तेका रोना था कि उधर भगवान दोनों हाथोंमें अपना मस्तक थामकर बैठ गये।
भगवानको श्रीमुकुट थामे देख आउसाका रंग उड गया। वह भागकर उनके पास जा पहुँची। उसने अकुलाकर खिन्न मनसे पूछा - 'महाराज! मैंने मारा तो कुत्तेको है, आप कयों मस्तक थामकर बैठ गये हैं ?'
भगवानने समझाया - 'आउसा ! ईश्वरस्वरूप सर्वत्र व्यापक है। किसी जीव पर किये प्रहारका इसीलिये वह अनुभव करता है। तुमने उस प्राणीको पत्थर मारा, उसकी पीड़ा हमें हुई, इसीलिए हमने मस्तक थाम लिया।' फिर उन्होंने कुछ थमकर पूछा - 'बताओ तो तुमने उसे मारा कयों है ?'
आउसाने उत्तर दिया, 'महाराज! कल यही कुत्ता नागदेवके भिक्षान्नकी झोली उठा ले गया था। आज यह पुनः कुछ उठानेकी नीयतसे आया था। यदि मैं इसे न मारती, तो यह अवश्य ही आज भी कुछ ले भागता। अतः मैंने उसे समुचित दंड दिया है , तो कोई अपराध नहीं किया।'
भगवानने कहा, 'आउसा ! मनुष्यके समान इसे पकाकर खिलानेवाला तो कोई है नहीं, जहाँ जाकर यह आरामसे खायेगा। इस बेचारेने तो इसी तरह घूम-फिरकर पेट भरना है। तुम अपनी चीजोंको सम्भालकर रखो, उसके लिए इसे क्यों दंडित करती हो ? यह तो खुद तुम्हारा दोष है। इस तरह वस्तुओंको असुरक्षित रखोगी, तो यह तो मुँह मारेगा ही।'
भगवानके उदात्त विचारोंके आगे आउसा नतमस्तक हो गई और उसने *अपने अपराधकी क्षमा माँगकर पुनः वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा ली।
।। जय श्री चक्रधर जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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