उत्तरार्ध लीला क्रमांक 206 | लीला चरित्

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2024-01-14 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1705235400

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

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केशववीहीरी उद्यापनी सातरा आरोगणा:...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

ऋद्धपुर च्या पुर्वेला तिवसा रोडवर असलेली श्री गोविंद प्रभुं चरणांकित, ही विहिर सासु, सुनेची विहिर म्हणून प्रसिद्ध आहे.
लिळा : नगराच्या पूर्वेस केशवनायकांनी विहिर खोदली. परंतु पाणी लागत नाही म्हणुन चिंतित झाले. मग श्रीप्रभु बाबांना विनंती केली, “ बाबा मी खुप कष्टाने विहिर खोदली परंतु पाणी लागत नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, “अवो मेला जाए, वीहीरी खणावी म्हणे : न खणावी म्हणे : मेला जाए खणावीची म्हणे :” तेंव्हा केशव नायक म्हणाले, “जी,जी एव्हडी खोल विहिर खोदली परंतु पाणी लागले नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, अवो मेला जाए खण म्हणे : आणि श्री चरणाचा अंगठा लावला. केशवनायकांनी थोडे खोदताच, खुप पाणी लागले. संपुर्ण विहिर पाण्याने भरली. सर्वजन आश्चर्यचकित झाले.
नंतर केशवनायकांनी सुंदर चिरेबंदी विहिर बांधली. आता फक्त वरील काठ बांधणे बाकी होते. तेंव्हा श्रीप्रभु म्हणाले, “मेला जाए, सीसवठी न बांधता, अगोदर उद्यापन कर म्हणे :” केशव नायक म्हणाले, ज्याअर्थी गोसावी म्हणतात तेंव्हा पुढे काही तरी कठीन प्रसंग असेल ! म्हणून उद्यापण करवित असतील. मग केशव नायकांनी उद्यापऩाची तयारी केली. माडव घातला, ब्राम्हण बोलावले, हवण केले, ब्राम्हणाला जेउ घातले. नंतर गोसावी तेथे बीजे केले, विहीरीमधे एका ठिकाणी बसुन आरोगणा झाली.
इकडे त्याच दिवसी कटक देवगीरीला विठ्ठलनायक व दाएनायकांना, जे राज दरबारा मधे दरबारी होते तृटी आली म्हणून पकडले. केशवनायक त्यांचे व्याही होते, व त्यांनी काही वस्तू केशवनायकां कडे ठेवली होती. म्हणून केशवनायक ही नागवले गेले. तेंव्हा केशवनायक म्हणाले, “राउळांनी येणा-या संकटाची सुचना म्हणून उद्यापण करविले..! [ऋ.च. १५५]

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

🌸 बिना भाग्य जो वस्तु ईश्वर अवतार देते है वह लिला ज्ञान कहलाता है।
🌸 अवतार के सम्बन्ध से जो फल प्राप्त होता है वह सम्बन्धदान है।
🌸 जोवो के कर्मों को ग्रहण कर उन्हे सीघ्रता से भुगवाने को ग्रहणा दान कहते है।
🌸 ईश्वर स्वरूप की प्राप्ती होना यह कैवल्यदान कहलाता है।

ईस प्रकार ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के दान दिये जाते है।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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उत्तरार्ध लीला क्रमांक 206 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
किसी दिन सुबह का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी छिन्नस्थली स्थान की तरफ गए! गुफा में आकर महाराज ने नाथोबा और नागदेव जी के सिर आपस में मिला दिए और स्थिति सुख अनुभव करवाया! स्वयं वापिस लौट आए तो बाईसा माताजी ने उन दोनों के विषय में पूछा! तब भगवान जी ने कहा, वे दोनों आपस में भिड़े हुए हैं! जाओ उन्हें ले आओ! बाईसा माताजी नाथोबा और नागदेव जी को बुला लाई! उन दोनों ने आकर स्थिति सुख का आनंद लेने के विषय में भगवान जी को बताया! स्वामी जी कहने लगे, अभी तो हमसे प्राप्त हुआ स्थिति सुख आपको इतना आनंद दे रहा है तो सोचो हमारा परमानंद आपको कितना प्रफुल्लित करेगा! इसका आपको आभास भी नहीं है!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी महाराज...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

पूर्वार्ध:-
🌸 १) पैठण.. शके ११९०, रवि ०७.१०.१२६८
🌸 २) सिन्नर.. शके ११९१, शनि २६.१०.१२६९
🌸 ३) बिड.. शके ११९२, बुध, १५.१०.१२७०
🌸 ४) जालना.. शके ११९३, सोम ०५.१०.१२७१

उत्तरार्ध:-
🌸 ५) डोमेग्राम.. शके ११९४, शनि २२.१०.१२७२
🌸 ६) नेवासा.. शके ११९५, बुध ११.१०.१२७३
🌸 ७) पैठण.. शके ११९६, सोम ०१.१०.१२७४
🌸 ८) आंबा [शेकटा].. शके ११९७, रवि २०.१०.१२७५

महात्माओं की दीवाली:-
एक दिन महदाइसाने भगवानसे प्रार्थना की, ‘महाराज ! मैं आपकी सेवामें दीवालीका त्यौहार मनाऊँगी।’ भगवानने आज्ञा दी, ‘हमारे साथ महात्मालोगोंकी भी दीवाली मनायी जाये। त्यौहार मनानेका सामान यदि कम हो, तो नागुबाइसासे माँग लो।’

महदाइसाने ‘जो आज्ञा’ कहकर सबको स्नान करानेके लिये संध्याके समय ही पानी भर लिया। उमाइसाके घरसे उबटन, तेल तथा साबुन ले आयी। उस दिन भगवान बहुत सवेरे उठकर शौच आदिसे निवृत्त होकर आसनपर आ बैठे। भक्तलोगोंको भी बैठाया गया। महदाइसाने भक्त तथा भगवानकी आरती उतारी और भगवानको वीड़ा दिया। महदाइसाने भगवानके शरीरपर उबटन मला। उस कटोरीमें और तेल डालकर उसने भक्तोंको दिया। उन्होंने उबटनसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरका मर्दन किया। उसने भगवानके सिरपर तेलकी मालिश की। भगवानको ऊँचे चबूतरेपर बिठलाया गया। नारियलके दूधसे उनका सिर धोया गया। भक्तजनोंको भी हरे नारियलका दूध सिरमें लगानेको दिया गया। उन्होंने एक-दूसरेके सिरपर मल लिया। फिर भगवानको जलसे नहलाया गया। महदाइसा पानी डाल रही थी और बाइसाजी सिर तथा शरीरको मल रही थी। भक्तलोग चबूतरेके नीचे खड़े होकर उस पानीसे नहा रहे थे। अंतमें जब भगवानकी श्रीमूर्तिपर पानीकी धार डाली गयी, तो भगवानने दोनों हाथ सिरपर रख लिये। पानी कुहनियोंसे होकर बहने लगा। उस पानीसे भक्तजन नहाये। इस प्रकार भगवान तथा भक्तोंको स्नान करवाया गया ।

शरीरपर बाल अधिक होनेके कारण नागदेवजीको और अलग पानी देकर नहलाया गया। महदाइसाने कुछ वस्तुएँ लेकर भगवानके सिरसे वार दीं। उसके पश्चात भगवानने वस्त्र पहिन लिये। भगवानको आसनपर बिठलाकर उनकी पूजा की गयी। सभीको चंदनका तिलक लगाया गया। पुनश्च सभीके सिरपरसे कुछ वस्तुएँ वार दी गयीं। भगवानको वीड़ा और भक्तजनोंको पान दिये गये। भगवानने सबको पान खानेकी आज्ञा दी। सबने पान खाये। उतनेमें अरुणोदय हो जानेपर बाइसाजीने दैनिक पूजाअवसर किया। बादमें भगवान विहरणके लिये चले गये और महदाइसा भोजन बनानेमें लग गयी ।

विहरणसे भगवानके लौटनेपर महदाइसाने पूजाअवसर किया। भगवानके लिये थाल और भक्तोंके लिये पत्तलें परोसी गयीं। भगवानके साथ बैठकर सब भक्तजनोंने भोजन किया। इस प्रकार दीपावली मनायी गयी ।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तर...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तरफ आ रहे थे तभी एक विद्यावंत सुंदर वस्त्र पहने और माथे पर तिलक लगाए आगे आने लगे! भगवान जी ने उन्हें देखा और द्वार के पास पहुंच नागदेव जी को आज्ञा दी कि उस विद्यावंत पुरुष को वापिस भेज दिया जाए! नागदेव उनके पास गए और कहने लगे, क्या हो गया है इस टोलगी को? विद्यावंत होकर गा रहे हो? यहां कोई दान करने वाला बैठा है क्या?

फिर वह विधावंत व्यक्ति चला गया! उसकी जाने के बाद भगवान जी ने नागदेव जो को कहा, तुम महात्मा होकर ऐसे अपमान भरे शब्द कैसे बोल गए? उसे आराम से भेजने को कहा था न कि अपशब्द बोलने को! यहां कोई दानी नहीं बैठा क्या? फिर हम कौन हैं? साधक को परमेश्वर की मानसिक प्रवृति को भंग नहीं करनी चाहिए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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ज्ञान परम्परा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?

स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।

सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।

श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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