कामाख्या के निमित्त देह त्यागना

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-11-05 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrapani Prabhu, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1699187400

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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वज्री की लीला

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
बेलापुर के आदित्य मंदिर का आँगन। प्रातःकाल का समय। महदाइसा को कुछ घिसने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। उत्सुकता से भर वह बाहर आकर देखती है।

क्या देखती है कि सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी दोनों श्रीचरणों में टिकाए एक पत्थर पर एक काले रंग की ईंट (वज्री) को घिस रहे हैं। अपने उत्तरीय से वे अपना शीर्ष ढंके हुए हैं। अंगिए की बाँहें उन्होंने ऊपर की हुई हैं।

कुतूहल से भर महदाइसा निकट आ खड़ी होती है। चुपचाप। स्वामीजी व्यस्त हैं। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं। सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही हैं।

महदाइसा को कुछ समझ नहीं आती कि स्वामीजी क्या कर रहे हैं? वह जाती है और जाकर नागदेव को बुला लाती है।

कुछ घिस जाने पर स्वामीजी उस वज्री को उलटपलट कर देखते हैं। सही हो गई कि नहीं? सही न पा उसे फिर घिसने लगते हैं।

जब महदाइसा-नागदेव को कुछ समझ नहीं पड़ा तो उनसे रहा नहीं गया। महदाइसा ने तन्मयता भंग करते पूछ ही लिया, 'जी जी: यह आप क्या कर रहे हैं?' पीछे मुड़ स्वामीजी बोले, 'बाई, यह हमने एक वज्री गढ़ी है!

वज्री अर्थात् वारितुरंग। जल में तैरनेवाला घोड़ा, जो पानी से घिरे द्वीप में रहता है और उसमें तैर लेता है। डूबता नहीं। उसे वारितुरंग कहते हैं। उसी की तरह हमने अपने हाथों यह वज्री गढ़ी है। यह सदा पानी में तैरती रहेगी। कभी डूबेगी नहीं।

यह कहते स्वामीजी ने वह वज्री सामने करते दोनों को दिखाई

बरसों बाद महदाइसा ने इसी अनुपम लीला का स्मरण करतेकरते नौगाँव में अपने अंतिम श्वास छोड़े।

ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस लीला का नित्य स्मरण जीव को अवश्यमेव इस संसार-सागर से पार करा देता है। जन्ममरण के चक्र से मुक्त करा देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल के स्मरण में इस फलदायक लीला को अवश्य अपने ध्यान में लाएँ।

सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी की सदा ही जय हो!
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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उत्तरार्ध लीला क्रमांक 205 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
फिर किसी दिन रात का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी आंगन में शत्पदी करते हुए चांदनी रात की तरफ इशारा करने लगे! भगवान जी की इच्छा थी कि कहीं बाहर घूमने के लिए निकला जाए! बाईसा माताजी जी को कह कर तैयारी करवाई गई! भगवान जी की सवारी के लिए सभी भक्तजन तैयार थे किंतु उनमें से नागदेव जी को घोड़ा बनने के लिए महाराज ने तैयार किया! भगवान जी ने अपने रेशमी वस्त्र को दोनों तरफ से बांध लिया और कमर के पीछे कर राजा की भांति सवार हो गए! सभी के हाथों में लाठी थी! नागदेव जी को भगवान जी ने स्थिति सुख दिया जिसके प्रभाव से वे घोड़े की तरह हिनहिनाते हुए तेज गति से चलने लगे! छिनस्थली गुफा में आकर भगवान जी रुके और भक्तजनों ने अपनी लाठी की मशाल से आरती जलाई! सुंदर पूजा अर्चना कर भगवान जी के लिए आसन बनाया गया! सिंदोले गव्हाण गांव से दूध लाकर भक्तजनों ने भगवान जी को दूध चावल का भोजन करवाया! फिर स्वामी जी ने सभी भक्तों को प्रसाद दिया और वापिस राजमठ लौट आए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तर...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तरफ आ रहे थे तभी एक विद्यावंत सुंदर वस्त्र पहने और माथे पर तिलक लगाए आगे आने लगे! भगवान जी ने उन्हें देखा और द्वार के पास पहुंच नागदेव जी को आज्ञा दी कि उस विद्यावंत पुरुष को वापिस भेज दिया जाए! नागदेव उनके पास गए और कहने लगे, क्या हो गया है इस टोलगी को? विद्यावंत होकर गा रहे हो? यहां कोई दान करने वाला बैठा है क्या?

फिर वह विधावंत व्यक्ति चला गया! उसकी जाने के बाद भगवान जी ने नागदेव जो को कहा, तुम महात्मा होकर ऐसे अपमान भरे शब्द कैसे बोल गए? उसे आराम से भेजने को कहा था न कि अपशब्द बोलने को! यहां कोई दानी नहीं बैठा क्या? फिर हम कौन हैं? साधक को परमेश्वर की मानसिक प्रवृति को भंग नहीं करनी चाहिए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष:
१) रूषी वेष
२) बाल वेष
३) मातंग वेष
४) ब्राम्हण वेष
५) गोंधळी वेष
६) कुष्टी वेष
७) व्याघ्र वेष
८) अवधुत वेष
९) पारधी वेष
१०) दिगंबर वेष

शकोणत्या वेषाने कोणाला भेट दिली:
१) रूषी वेष – सहस्त्रार्जुन
२) बालवेष – अनुसूया , पार्वती , लक्ष्मी ,सावित्री
३) मातंग वेष – अर्ळक राजा
४) ब्राह्मण वेष – रेणुकेचा निक्षेप करते वेळेसपरशुरामाला
५) गोंधळी वेष- डखले , चांगदेवभट
६) कुष्टी वेष – सप्त रूषी
७) व्याघ्र वेष – चक्रपाणि महाराज
८) अवधुत वेष – यदुराजा , मदाळसाराणी
९) पारधी वेष – परशुराम
१०) दिगंबर वेष – शंकराचार्य

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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श्री गोविन्द प्रभु महाराज जी के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

गोविन्द प्रभु भगवान जी के अवतारोत्सव पर हम जितने पदार्थ बनने में सक्षम है उतने पदार्थ बना का प्रभु जी को को भोग लगाना चाहिए।
1 - लाख की भाकर, गुड़ की रोटियां, दलिया
2 - दही दूध और माखन, श्री खंड, गुलाब जामुन
3- पकोड़े (बुड़ुदे), धिडरे (बेसन से बना हुआ पुडा), काजू
4 - गुड़, गुड़ और भुने चने, कच्चे ज्वार के दाने
5 - देसी घी, मक्खन, गुड़ और देसी घी से बनी सेवइयां
6 - मीठी ककड़ी, दही भल्ले, खीर
7 - बैंगन की सब्जी, साग
8 - तरबूज, बेर, संतरे, आम का रस
9 - आउसा जी का प्रसिद्ध हलवा

इत्यादि पदार्थ भगवान जी को अच्छे लगते थे।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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केशववीहीरी उद्यापनी सातरा आरोगणा:...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

ऋद्धपुर च्या पुर्वेला तिवसा रोडवर असलेली श्री गोविंद प्रभुं चरणांकित, ही विहिर सासु, सुनेची विहिर म्हणून प्रसिद्ध आहे.
लिळा : नगराच्या पूर्वेस केशवनायकांनी विहिर खोदली. परंतु पाणी लागत नाही म्हणुन चिंतित झाले. मग श्रीप्रभु बाबांना विनंती केली, “ बाबा मी खुप कष्टाने विहिर खोदली परंतु पाणी लागत नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, “अवो मेला जाए, वीहीरी खणावी म्हणे : न खणावी म्हणे : मेला जाए खणावीची म्हणे :” तेंव्हा केशव नायक म्हणाले, “जी,जी एव्हडी खोल विहिर खोदली परंतु पाणी लागले नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, अवो मेला जाए खण म्हणे : आणि श्री चरणाचा अंगठा लावला. केशवनायकांनी थोडे खोदताच, खुप पाणी लागले. संपुर्ण विहिर पाण्याने भरली. सर्वजन आश्चर्यचकित झाले.
नंतर केशवनायकांनी सुंदर चिरेबंदी विहिर बांधली. आता फक्त वरील काठ बांधणे बाकी होते. तेंव्हा श्रीप्रभु म्हणाले, “मेला जाए, सीसवठी न बांधता, अगोदर उद्यापन कर म्हणे :” केशव नायक म्हणाले, ज्याअर्थी गोसावी म्हणतात तेंव्हा पुढे काही तरी कठीन प्रसंग असेल ! म्हणून उद्यापण करवित असतील. मग केशव नायकांनी उद्यापऩाची तयारी केली. माडव घातला, ब्राम्हण बोलावले, हवण केले, ब्राम्हणाला जेउ घातले. नंतर गोसावी तेथे बीजे केले, विहीरीमधे एका ठिकाणी बसुन आरोगणा झाली.
इकडे त्याच दिवसी कटक देवगीरीला विठ्ठलनायक व दाएनायकांना, जे राज दरबारा मधे दरबारी होते तृटी आली म्हणून पकडले. केशवनायक त्यांचे व्याही होते, व त्यांनी काही वस्तू केशवनायकां कडे ठेवली होती. म्हणून केशवनायक ही नागवले गेले. तेंव्हा केशवनायक म्हणाले, “राउळांनी येणा-या संकटाची सुचना म्हणून उद्यापण करविले..! [ऋ.च. १५५]

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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