दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमाने संपुर्ण शरणागती

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-07-02 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
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🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

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सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी महाराज...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

पूर्वार्ध:-
🌸 १) पैठण.. शके ११९०, रवि ०७.१०.१२६८
🌸 २) सिन्नर.. शके ११९१, शनि २६.१०.१२६९
🌸 ३) बिड.. शके ११९२, बुध, १५.१०.१२७०
🌸 ४) जालना.. शके ११९३, सोम ०५.१०.१२७१

उत्तरार्ध:-
🌸 ५) डोमेग्राम.. शके ११९४, शनि २२.१०.१२७२
🌸 ६) नेवासा.. शके ११९५, बुध ११.१०.१२७३
🌸 ७) पैठण.. शके ११९६, सोम ०१.१०.१२७४
🌸 ८) आंबा [शेकटा].. शके ११९७, रवि २०.१०.१२७५

महात्माओं की दीवाली:-
एक दिन महदाइसाने भगवानसे प्रार्थना की, ‘महाराज ! मैं आपकी सेवामें दीवालीका त्यौहार मनाऊँगी।’ भगवानने आज्ञा दी, ‘हमारे साथ महात्मालोगोंकी भी दीवाली मनायी जाये। त्यौहार मनानेका सामान यदि कम हो, तो नागुबाइसासे माँग लो।’

महदाइसाने ‘जो आज्ञा’ कहकर सबको स्नान करानेके लिये संध्याके समय ही पानी भर लिया। उमाइसाके घरसे उबटन, तेल तथा साबुन ले आयी। उस दिन भगवान बहुत सवेरे उठकर शौच आदिसे निवृत्त होकर आसनपर आ बैठे। भक्तलोगोंको भी बैठाया गया। महदाइसाने भक्त तथा भगवानकी आरती उतारी और भगवानको वीड़ा दिया। महदाइसाने भगवानके शरीरपर उबटन मला। उस कटोरीमें और तेल डालकर उसने भक्तोंको दिया। उन्होंने उबटनसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरका मर्दन किया। उसने भगवानके सिरपर तेलकी मालिश की। भगवानको ऊँचे चबूतरेपर बिठलाया गया। नारियलके दूधसे उनका सिर धोया गया। भक्तजनोंको भी हरे नारियलका दूध सिरमें लगानेको दिया गया। उन्होंने एक-दूसरेके सिरपर मल लिया। फिर भगवानको जलसे नहलाया गया। महदाइसा पानी डाल रही थी और बाइसाजी सिर तथा शरीरको मल रही थी। भक्तलोग चबूतरेके नीचे खड़े होकर उस पानीसे नहा रहे थे। अंतमें जब भगवानकी श्रीमूर्तिपर पानीकी धार डाली गयी, तो भगवानने दोनों हाथ सिरपर रख लिये। पानी कुहनियोंसे होकर बहने लगा। उस पानीसे भक्तजन नहाये। इस प्रकार भगवान तथा भक्तोंको स्नान करवाया गया ।

शरीरपर बाल अधिक होनेके कारण नागदेवजीको और अलग पानी देकर नहलाया गया। महदाइसाने कुछ वस्तुएँ लेकर भगवानके सिरसे वार दीं। उसके पश्चात भगवानने वस्त्र पहिन लिये। भगवानको आसनपर बिठलाकर उनकी पूजा की गयी। सभीको चंदनका तिलक लगाया गया। पुनश्च सभीके सिरपरसे कुछ वस्तुएँ वार दी गयीं। भगवानको वीड़ा और भक्तजनोंको पान दिये गये। भगवानने सबको पान खानेकी आज्ञा दी। सबने पान खाये। उतनेमें अरुणोदय हो जानेपर बाइसाजीने दैनिक पूजाअवसर किया। बादमें भगवान विहरणके लिये चले गये और महदाइसा भोजन बनानेमें लग गयी ।

विहरणसे भगवानके लौटनेपर महदाइसाने पूजाअवसर किया। भगवानके लिये थाल और भक्तोंके लिये पत्तलें परोसी गयीं। भगवानके साथ बैठकर सब भक्तजनोंने भोजन किया। इस प्रकार दीपावली मनायी गयी ।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
🌸 दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमाने संपुर्ण शरणागती
🌸 दंडवत हा शब्द प्राचीन ग्रंथ रचनेत सुद्धा आला आहे
🌸 दंडवत दोन प्रकारे केल्या जातो ,एक वाचिके कायाप्रणीत कंबरेपासुन वाकुन दंडवत बोलने
🌸 दुसरा दंडवत संपुर्ण शरीर जमीनीवर काठिवत् टाकने
🌸 लीळाचरीत्रात बाईसा राशी दंडवत् घालत होत्या स्वामींच्या दर्शनाला आलेले भक्तजन पाच दंडवत घालुन श्रीचरणी लागत, स्वामी चांगदेव भटाला रिद्दपुरला गेल्यावर घाला घाला दंडवत म्हटले
🌸 आपण सुद्दा स्थानाला गेल्यावर प्रथम बाहेर पाच दंडवत घालुन त्या स्थानाची लीळा आठवावी,नंतर हात सोवळे करुण स्थान वंदन करावे पुनश्च संपुर्ण विधी झाल्यावर दंडवत घालुन मंदिराच्या बाहेर पडावे
🌸 दंडवत घातल्याने जीव स्वरुपी आलेला आसळगै ,पातलेपणा निघुन जातो व साधक विधी करण्यास दक्ष होतो
🌸 दंडवताने रोग नाहिसे होतात ,कारण दंडवत हा एक ऊत्तम व्यायाम आहे,वाय,कफ,पित्त बाधत नाहित
🌸 दंडवत घालताना लीळाचरीत्रातील दंडवताच्या लिळा आठवल्याने जीव स्वरुपाची योग्यता वाढते ईत्यादि अनेक फायदे आहेत
🌸 परमेश्वराच्या सर्व साधकाने एकमेकांना भेटल्यावर वाकुन ,नम्रतेने ,श्रद्धेने आवडिने दंडवत केला तर स्वामी भेटलेयाचे गोमटे होते

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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वज्री की लीला

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
बेलापुर के आदित्य मंदिर का आँगन। प्रातःकाल का समय। महदाइसा को कुछ घिसने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। उत्सुकता से भर वह बाहर आकर देखती है।

क्या देखती है कि सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी दोनों श्रीचरणों में टिकाए एक पत्थर पर एक काले रंग की ईंट (वज्री) को घिस रहे हैं। अपने उत्तरीय से वे अपना शीर्ष ढंके हुए हैं। अंगिए की बाँहें उन्होंने ऊपर की हुई हैं।

कुतूहल से भर महदाइसा निकट आ खड़ी होती है। चुपचाप। स्वामीजी व्यस्त हैं। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं। सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही हैं।

महदाइसा को कुछ समझ नहीं आती कि स्वामीजी क्या कर रहे हैं? वह जाती है और जाकर नागदेव को बुला लाती है।

कुछ घिस जाने पर स्वामीजी उस वज्री को उलटपलट कर देखते हैं। सही हो गई कि नहीं? सही न पा उसे फिर घिसने लगते हैं।

जब महदाइसा-नागदेव को कुछ समझ नहीं पड़ा तो उनसे रहा नहीं गया। महदाइसा ने तन्मयता भंग करते पूछ ही लिया, 'जी जी: यह आप क्या कर रहे हैं?' पीछे मुड़ स्वामीजी बोले, 'बाई, यह हमने एक वज्री गढ़ी है!

वज्री अर्थात् वारितुरंग। जल में तैरनेवाला घोड़ा, जो पानी से घिरे द्वीप में रहता है और उसमें तैर लेता है। डूबता नहीं। उसे वारितुरंग कहते हैं। उसी की तरह हमने अपने हाथों यह वज्री गढ़ी है। यह सदा पानी में तैरती रहेगी। कभी डूबेगी नहीं।

यह कहते स्वामीजी ने वह वज्री सामने करते दोनों को दिखाई

बरसों बाद महदाइसा ने इसी अनुपम लीला का स्मरण करतेकरते नौगाँव में अपने अंतिम श्वास छोड़े।

ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस लीला का नित्य स्मरण जीव को अवश्यमेव इस संसार-सागर से पार करा देता है। जन्ममरण के चक्र से मुक्त करा देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल के स्मरण में इस फलदायक लीला को अवश्य अपने ध्यान में लाएँ।

सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी की सदा ही जय हो!
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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प्रातः काल का पूजा अवसर हो जाने क...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान जी प्रातः काल का पूजा अवसर हो जाने के बाद छिन्नस्थली विहरण के लिए गए! वहां से सिंह नारायण के मंदिर में आकर आसन पर बैठे! इतने में ही इन्द्रभट्ट आए और सम्मुख बैठ गए! उन्हें भोजन के लिए नियंत्रण देना था किंतु याद ही नहीं रहा! आसमान में बादल देखते ही महाराज ने संकेत किया कि इन्द्रभट्ट तुम शीघ्र अपने घोगर गांव चले जाओ अन्यथा भीग जाओगे!

इन्द्रभट्ट बचते हुए जैसे ही गांव पहुंचे वैसे ही बारिश शुरू हो गई! इधर भक्तजन कपड़े का चंदोवा बना कर भगवान जी के ऊपर लगा चलने लगे! कभी जानबूझ कर लीला के हेतु से महाराज पीछे रह जाते तो कभी आगे निकल आते! जब तक भक्तजन चांदोवा आगे पीछे करते तब तक महाराज भीग जाते! इस प्रकार उनके वस्त्र गीले देख रेइनायक के घर से दूसरे वस्त्र मंगवाए गए! सभी भक्तों ने भी राजमठ वापिस लौट कर दूसरे वस्त्र धारण किए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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केशववीहीरी उद्यापनी सातरा आरोगणा:...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

ऋद्धपुर च्या पुर्वेला तिवसा रोडवर असलेली श्री गोविंद प्रभुं चरणांकित, ही विहिर सासु, सुनेची विहिर म्हणून प्रसिद्ध आहे.
लिळा : नगराच्या पूर्वेस केशवनायकांनी विहिर खोदली. परंतु पाणी लागत नाही म्हणुन चिंतित झाले. मग श्रीप्रभु बाबांना विनंती केली, “ बाबा मी खुप कष्टाने विहिर खोदली परंतु पाणी लागत नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, “अवो मेला जाए, वीहीरी खणावी म्हणे : न खणावी म्हणे : मेला जाए खणावीची म्हणे :” तेंव्हा केशव नायक म्हणाले, “जी,जी एव्हडी खोल विहिर खोदली परंतु पाणी लागले नाही.” सर्वज्ञ म्हणाले, अवो मेला जाए खण म्हणे : आणि श्री चरणाचा अंगठा लावला. केशवनायकांनी थोडे खोदताच, खुप पाणी लागले. संपुर्ण विहिर पाण्याने भरली. सर्वजन आश्चर्यचकित झाले.
नंतर केशवनायकांनी सुंदर चिरेबंदी विहिर बांधली. आता फक्त वरील काठ बांधणे बाकी होते. तेंव्हा श्रीप्रभु म्हणाले, “मेला जाए, सीसवठी न बांधता, अगोदर उद्यापन कर म्हणे :” केशव नायक म्हणाले, ज्याअर्थी गोसावी म्हणतात तेंव्हा पुढे काही तरी कठीन प्रसंग असेल ! म्हणून उद्यापण करवित असतील. मग केशव नायकांनी उद्यापऩाची तयारी केली. माडव घातला, ब्राम्हण बोलावले, हवण केले, ब्राम्हणाला जेउ घातले. नंतर गोसावी तेथे बीजे केले, विहीरीमधे एका ठिकाणी बसुन आरोगणा झाली.
इकडे त्याच दिवसी कटक देवगीरीला विठ्ठलनायक व दाएनायकांना, जे राज दरबारा मधे दरबारी होते तृटी आली म्हणून पकडले. केशवनायक त्यांचे व्याही होते, व त्यांनी काही वस्तू केशवनायकां कडे ठेवली होती. म्हणून केशवनायक ही नागवले गेले. तेंव्हा केशवनायक म्हणाले, “राउळांनी येणा-या संकटाची सुचना म्हणून उद्यापण करविले..! [ऋ.च. १५५]

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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एक दिन महदाइसा ने श्री चकर्धर स्व...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी जी ने उत्तर दिया, महदाइसा! जब भगवन श्री कृष्ण जी राजा कंस का वध करके कारागर की ओर जाने लगे तो वहा देखा की उद्धव देव भयभीत स्तम्भ के पीछे खड़े थे।
श्री कृष्ण जी ने उन्हें छिपा देख कर कहा, अरे! वहा कूँ खड़ा है। उतर देते हुए अन्य सेवक ने कहा। प्रभु जी वहा पर राजा कंस के प्रधान मंत्री है। तत्काल उद्धव ने कहा, प्रभु जी में अपनी बुद्धि से कुछ मंत्रणा कंस के समुख रखा करता था। तब प्रभु जी ने कहा, आपने आजतक कंस का अमात्यतव सवीकारा था, अब आजसे आप हमारा मंत्रितब धारण करो ओर हमे मंत्रणा दिया करो।
प्रभु जी के इन्ही वचनों के साथ उद्धव देव को प्रेम संक्रमण हुआ ओर उन्होंने प्रभु जी को सहस्तांग दंडवत प्रणाम कर, खुदको धन्य माना|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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