पञ्च कृष्ण अवतारों के स्मरण के बाद अपने गुरु का स्मरण

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-08-13 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
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🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

भगवान श्री कृष्ण जी को छप्पन भोग ...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है। इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है। यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है।
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया:
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी। अर्थात् बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे। जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ। भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया।

गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग:
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों। श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी। व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया।
छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं। उस कमल की तीन परतें होती हैं…प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह” और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं। इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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वज्री की लीला

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
बेलापुर के आदित्य मंदिर का आँगन। प्रातःकाल का समय। महदाइसा को कुछ घिसने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। उत्सुकता से भर वह बाहर आकर देखती है।

क्या देखती है कि सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी दोनों श्रीचरणों में टिकाए एक पत्थर पर एक काले रंग की ईंट (वज्री) को घिस रहे हैं। अपने उत्तरीय से वे अपना शीर्ष ढंके हुए हैं। अंगिए की बाँहें उन्होंने ऊपर की हुई हैं।

कुतूहल से भर महदाइसा निकट आ खड़ी होती है। चुपचाप। स्वामीजी व्यस्त हैं। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं। सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही हैं।

महदाइसा को कुछ समझ नहीं आती कि स्वामीजी क्या कर रहे हैं? वह जाती है और जाकर नागदेव को बुला लाती है।

कुछ घिस जाने पर स्वामीजी उस वज्री को उलटपलट कर देखते हैं। सही हो गई कि नहीं? सही न पा उसे फिर घिसने लगते हैं।

जब महदाइसा-नागदेव को कुछ समझ नहीं पड़ा तो उनसे रहा नहीं गया। महदाइसा ने तन्मयता भंग करते पूछ ही लिया, 'जी जी: यह आप क्या कर रहे हैं?' पीछे मुड़ स्वामीजी बोले, 'बाई, यह हमने एक वज्री गढ़ी है!

वज्री अर्थात् वारितुरंग। जल में तैरनेवाला घोड़ा, जो पानी से घिरे द्वीप में रहता है और उसमें तैर लेता है। डूबता नहीं। उसे वारितुरंग कहते हैं। उसी की तरह हमने अपने हाथों यह वज्री गढ़ी है। यह सदा पानी में तैरती रहेगी। कभी डूबेगी नहीं।

यह कहते स्वामीजी ने वह वज्री सामने करते दोनों को दिखाई

बरसों बाद महदाइसा ने इसी अनुपम लीला का स्मरण करतेकरते नौगाँव में अपने अंतिम श्वास छोड़े।

ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस लीला का नित्य स्मरण जीव को अवश्यमेव इस संसार-सागर से पार करा देता है। जन्ममरण के चक्र से मुक्त करा देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल के स्मरण में इस फलदायक लीला को अवश्य अपने ध्यान में लाएँ।

सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी की सदा ही जय हो!
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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परमेश्वराचे प्रेमदानास प्राप्त झा...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

नागूबाई पैठणकर (बाईसा) - परमेश्वराचे प्रेमदानास प्राप्त झालेली परमेश्वर सेवक बाईसा
– गोदावरीच्या काठावर बसलेल्या पैठण शहराची निर्मीती शालिवाहन राजा याने केली
– याच शालीवाहन राजाने मराठी शके सुरू केली …तेव्हापासून शालीवाहन शके असे म्हणतात
– या पैठण नगरी मध्ये थोर संत महंत ज्योतीषी रहात होते
– या शहरात न्याय निवाडा करण्याचे काम चालत असत
– येथील लोक वैदिक कर्मकांडात गुंतलेले होते
– नागूबाई या बालविधवा
– व्रत वैकल्ये करून जीवन व्यतीत करीत होत्या
– त्यांनी शैवपंथाच्या सुमूर्ताबाई यांना गुरू केले व त्यांची पुजा अर्चा करू लागल्या
– त्या कालवश झाल्यावर त्यांच्या जागेवर नागूबाई बसल्या व शीष्यांकरवी स्वतःची पुजा अर्चा करू लागल्या
– स्वामी त्र्यंबकेश्वरला जाण्यासाठी निघाले असता पैठणला आले
– बाजारामध्येच स्वामींची भेट झाली
– नागूबाई यांनी स्वामींना आपल्या सोबत गुंफेमध्ये आणले
– बसायला पाय पुसणी आणी भोपळ्याच्या करंटीमध्ये पाणीभात (पाण्यात भीजवलेले वाळलेल्या भाकरीचे तुकडे) दिला
– दोन दिवसांचा स्वामींचा क्रम असा असे… नागूबाई यांच्याकडे जेवण आणी भोगनारायण मंदिरात निद्रा
– नागूबाई स्वामींना बसायला पायपुसणी देत वा स्वतः उच्च आसनावर बसून भक्तांच्या कडून स्वतःची पुजा अर्चा करीत असत
– तिसऱ्या दिवशी नागूबाई यांची पुजा सुरू असताना त्यांची व स्वामींची नजरानजर झाली. क्रूपाद्रूष्टिने जीव ईश्वर भाव उमटविला
– श्रेष्ठत्व, वयोवृद्धत्व, तपोवृद्धत्व हे तिन दोष नाहिसे केले
– नागूबाई यांचे अंतःकरण पोळले. त्यांनी स्वामींना उच्च आसनावर बसवून पुजा अर्चा केली
– त्यांनी शेवट पर्यंत स्वामींची त्रीकाळ (सकाळ, दुपार , संध्याकाळ ) पुजा अर्चा केली
– मंगल आरतीची सुरवात त्या अशा पध्दतीने करत - जयतु मंगल मंगला परम मंगलरूपा
– पुजा करीत असताना त्यांना अष्ट भाव प्रकटे… थर थर कापणे, रोमांच उभे रहाणे, अश्रूधारा, स्वर भंग, रंग पालटे, ताठपणा येई, घाम सुटे, स्तब्धता येई…. मग स्वामी म्हणत… बाईसांच्या हातातील पालमांडे घ्या
– बाईसा असे नामकरण स्वामींच्या सन्निधानी आल्यावर झाले
– स्वामींना गरम पाणी देणे, आरोगणा (जेवण), व्याळी (रात्रीचे जेवण), स्वामींकरीता आसन टाकणे, रात्री शयनासन टाकणे इ. नित्य सेवा त्या करीत
– भक्तजनांवर माते सारखे प्रेम त्या करीत… स्वामींनी कुणाला शीक्षा केल्यास त्या मध्यस्थी करत
– सर्व भक्त जण बाईसांना विचारूनच स्वामींना उपहार वगैरे करीत
– जैसे मासे पाण्या शीवाय राहू शकत नाहीत तसे बाईसा आमच्याशीवाय राहू शकत नाहीत. .. असे स्वामी म्हणत
– या थोर माऊलीने स्वामींच्या वियोगाने बोटीतून उडी टाकून देहत्याग केला
सदर माहिती संग्रहावरून उपलब्ध झालेली आहे, काही चुकीचे असलेल्या गोष्टी बदल माफ करावी

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष:
१) रूषी वेष
२) बाल वेष
३) मातंग वेष
४) ब्राम्हण वेष
५) गोंधळी वेष
६) कुष्टी वेष
७) व्याघ्र वेष
८) अवधुत वेष
९) पारधी वेष
१०) दिगंबर वेष

शकोणत्या वेषाने कोणाला भेट दिली:
१) रूषी वेष – सहस्त्रार्जुन
२) बालवेष – अनुसूया , पार्वती , लक्ष्मी ,सावित्री
३) मातंग वेष – अर्ळक राजा
४) ब्राह्मण वेष – रेणुकेचा निक्षेप करते वेळेसपरशुरामाला
५) गोंधळी वेष- डखले , चांगदेवभट
६) कुष्टी वेष – सप्त रूषी
७) व्याघ्र वेष – चक्रपाणि महाराज
८) अवधुत वेष – यदुराजा , मदाळसाराणी
९) पारधी वेष – परशुराम
१०) दिगंबर वेष – शंकराचार्य

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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लाहीभट्टकी श्रवणजिज्ञासा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन लाहीभट्ट श्रीचक्रधर स्वामीजीके दर्शनोंको आया। प्रणाम करनेके उपरांत उसने भगवानसे कुछ सुननेकी प्रार्थना की। भगवान बोले, ' लाहीभट्ट, अपने मनमें धारण किये देवताविषयक सकाम कर्मोंको भुला देनेपर ही तुम हमारे उपदेशके वास्तविक अधिकारी बन सकते हो। उनके रहते ईश्वरीय ज्ञानकी प्राप्ति दुर्लभ है।'
लाहीभट्ट बोला, 'महाराज! देवताभक्त ईश्वरीय ज्ञानको धारण क्यों नही कर सकता ? उसमें भी तो कर्मकांड पर अटूट श्रद्धा रहती है।'
भगवानने समझाते हुए कहा, 'भट्ट! कोरा कर्मकांड मुक्ति नहीं दिला सकता। उससे तो केवल देवताओंके सुखफल ही प्राप्त हो सकते हैं। ईश्वरीय ज्ञानके लिये तो मनुष्यको एकनिष्ठ होना परम आवश्यक है ; क्योंकि जैसे एक मनुष्यके ठहरने पर उस स्थान पर दूसरा मनुष्य नहीं ठहर सकता, वैसे ही देवताविषयक अथवा सांसारिक कामनाओंसे ठसाठस भरे हुए हृदयमें ईश्वरीय ज्ञान चिरंतन कालतक ठहर नहीं सकता।'
सूत्र : वि. बाइः बिढारावरि काइ बिढारु असे ।।२६४ ।।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
जय चक्रपाणि महाराज जी

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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एक दिन महदाइसा ने श्री चकर्धर स्व...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी जी ने उत्तर दिया, महदाइसा! जब भगवन श्री कृष्ण जी राजा कंस का वध करके कारागर की ओर जाने लगे तो वहा देखा की उद्धव देव भयभीत स्तम्भ के पीछे खड़े थे।
श्री कृष्ण जी ने उन्हें छिपा देख कर कहा, अरे! वहा कूँ खड़ा है। उतर देते हुए अन्य सेवक ने कहा। प्रभु जी वहा पर राजा कंस के प्रधान मंत्री है। तत्काल उद्धव ने कहा, प्रभु जी में अपनी बुद्धि से कुछ मंत्रणा कंस के समुख रखा करता था। तब प्रभु जी ने कहा, आपने आजतक कंस का अमात्यतव सवीकारा था, अब आजसे आप हमारा मंत्रितब धारण करो ओर हमे मंत्रणा दिया करो।
प्रभु जी के इन्ही वचनों के साथ उद्धव देव को प्रेम संक्रमण हुआ ओर उन्होंने प्रभु जी को सहस्तांग दंडवत प्रणाम कर, खुदको धन्य माना|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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