उत्तरार्ध लीला क्रमांक 205 | लीला...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
फिर किसी दिन रात का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी आंगन में शत्पदी करते हुए चांदनी रात की तरफ इशारा करने लगे! भगवान जी की इच्छा थी कि कहीं बाहर घूमने के लिए निकला जाए! बाईसा माताजी जी को कह कर तैयारी करवाई गई! भगवान जी की सवारी के लिए सभी भक्तजन तैयार थे किंतु उनमें से नागदेव जी को घोड़ा बनने के लिए महाराज ने तैयार किया! भगवान जी ने अपने रेशमी वस्त्र को दोनों तरफ से बांध लिया और कमर के पीछे कर राजा की भांति सवार हो गए! सभी के हाथों में लाठी थी! नागदेव जी को भगवान जी ने स्थिति सुख दिया जिसके प्रभाव से वे घोड़े की तरह हिनहिनाते हुए तेज गति से चलने लगे! छिनस्थली गुफा में आकर भगवान जी रुके और भक्तजनों ने अपनी लाठी की मशाल से आरती जलाई! सुंदर पूजा अर्चना कर भगवान जी के लिए आसन बनाया गया! सिंदोले गव्हाण गांव से दूध लाकर भक्तजनों ने भगवान जी को दूध चावल का भोजन करवाया! फिर स्वामी जी ने सभी भक्तों को प्रसाद दिया और वापिस राजमठ लौट आए!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
फिर किसी दिन रात का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी आंगन में शत्पदी करते हुए चांदनी रात की तरफ इशारा करने लगे! भगवान जी की इच्छा थी कि कहीं बाहर घूमने के लिए निकला जाए! बाईसा माताजी जी को कह कर तैयारी करवाई गई! भगवान जी की सवारी के लिए सभी भक्तजन तैयार थे किंतु उनमें से नागदेव जी को घोड़ा बनने के लिए महाराज ने तैयार किया! भगवान जी ने अपने रेशमी वस्त्र को दोनों तरफ से बांध लिया और कमर के पीछे कर राजा की भांति सवार हो गए! सभी के हाथों में लाठी थी! नागदेव जी को भगवान जी ने स्थिति सुख दिया जिसके प्रभाव से वे घोड़े की तरह हिनहिनाते हुए तेज गति से चलने लगे! छिनस्थली गुफा में आकर भगवान जी रुके और भक्तजनों ने अपनी लाठी की मशाल से आरती जलाई! सुंदर पूजा अर्चना कर भगवान जी के लिए आसन बनाया गया! सिंदोले गव्हाण गांव से दूध लाकर भक्तजनों ने भगवान जी को दूध चावल का भोजन करवाया! फिर स्वामी जी ने सभी भक्तों को प्रसाद दिया और वापिस राजमठ लौट आए!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏

