परमेश्वराचे प्रेमदानास प्राप्त झालेली परमेश्वर सेवक बाईसा

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-07-23 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
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🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

उत्तरार्ध लीला क्रमांक 205 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
फिर किसी दिन रात का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी आंगन में शत्पदी करते हुए चांदनी रात की तरफ इशारा करने लगे! भगवान जी की इच्छा थी कि कहीं बाहर घूमने के लिए निकला जाए! बाईसा माताजी जी को कह कर तैयारी करवाई गई! भगवान जी की सवारी के लिए सभी भक्तजन तैयार थे किंतु उनमें से नागदेव जी को घोड़ा बनने के लिए महाराज ने तैयार किया! भगवान जी ने अपने रेशमी वस्त्र को दोनों तरफ से बांध लिया और कमर के पीछे कर राजा की भांति सवार हो गए! सभी के हाथों में लाठी थी! नागदेव जी को भगवान जी ने स्थिति सुख दिया जिसके प्रभाव से वे घोड़े की तरह हिनहिनाते हुए तेज गति से चलने लगे! छिनस्थली गुफा में आकर भगवान जी रुके और भक्तजनों ने अपनी लाठी की मशाल से आरती जलाई! सुंदर पूजा अर्चना कर भगवान जी के लिए आसन बनाया गया! सिंदोले गव्हाण गांव से दूध लाकर भक्तजनों ने भगवान जी को दूध चावल का भोजन करवाया! फिर स्वामी जी ने सभी भक्तों को प्रसाद दिया और वापिस राजमठ लौट आए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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ज्ञान शक्ती स्वीकार

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

इधर श्री चक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से (श्री दत्तात्रेय प्रभु) वाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्री चक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्री चक्रपाणी प्रभु श्री दत्तात्रेय प्रभु के (वाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी वाघने (श्री दत्तात्रेय प्रभु) श्री चक्रपाणी के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की, श्री चक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ “पराशक्ती” के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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कुम्भार बोला मुझे चौरासी लाख यानि...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

प्रभु श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ बहुत-सी लीलायें की हैं। श्री कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़ते और माखन चुराते और गोपियाँ श्री कृष्ण का उलाहना लेकर यशोदा मैया के पास जातीं। ऐसा बहुत बार हुआ।
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।
भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे। कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि ‘कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।’
तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, कुम्भार! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या?’
कुम्भार ने कह दिया – ‘नहीं, मैया! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।’ श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं। अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं – ‘कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’
कुम्भार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’
कुम्भार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।’
प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।’
अब कुम्भार कहता है – ‘बस, प्रभु जी! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
भगवान बोले – ‘वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो?’
कुम्भार कहने लगा – ‘प्रभु जी! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है। मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’
भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।’
प्रभु बोले – ‘अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’
तब कुम्भार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे। बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।
फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।
।। हरी व्यापक सर्वत्र समाना ।।
।। प्रेम से प्रकट होई मैं जाना ।।
मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता, चाहे कोई कर ल्यो कोटि उपाय।
करोड़ों उपाय भी चाहे कोई कर लो तो प्रभु को प्रेम के बिना कोई पा नहीं सकता।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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हमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)

|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)

|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)

|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)

|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तर...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तरफ आ रहे थे तभी एक विद्यावंत सुंदर वस्त्र पहने और माथे पर तिलक लगाए आगे आने लगे! भगवान जी ने उन्हें देखा और द्वार के पास पहुंच नागदेव जी को आज्ञा दी कि उस विद्यावंत पुरुष को वापिस भेज दिया जाए! नागदेव उनके पास गए और कहने लगे, क्या हो गया है इस टोलगी को? विद्यावंत होकर गा रहे हो? यहां कोई दान करने वाला बैठा है क्या?

फिर वह विधावंत व्यक्ति चला गया! उसकी जाने के बाद भगवान जी ने नागदेव जो को कहा, तुम महात्मा होकर ऐसे अपमान भरे शब्द कैसे बोल गए? उसे आराम से भेजने को कहा था न कि अपशब्द बोलने को! यहां कोई दानी नहीं बैठा क्या? फिर हम कौन हैं? साधक को परमेश्वर की मानसिक प्रवृति को भंग नहीं करनी चाहिए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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परशुराम जी को दर्शन

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
श्रीचक्रधर स्वामी जी ने कहा एक दिन कार्तवीर्य (सहस्त्रार्जुन ) अपने सैनिक परिवारके साथ शिकारके लिए निकला। जंगलोंमें भटकते भटकते उसे प्यास लगी। उसका एक सेवक पानीकी खोजमें जमदाग्नि ऋषिके आश्रममें पहुँच गया। उस समय जमदाग्नि और उसकी पत्नी एकवीरा (रेणुका) दोनों चोसर खेल रहे थे। सेवकने उनसे कहा 'हमारा राजा प्यासा है, उसके लिए पानी चाहिए। ' एकवीराने अपने कानकी मैल निकाल कर उसकी एक बटलोई बनाई, पानीसे भरा और उस सेवकको दिया। सेवकने कहा, ' इतने पानीसे क्या होगा ? ' एकवीराने कहा, ' जाओ, पूरा हो जाएगा। ' लेकर जाते जाते वह बटलोई टूट गई और वहाँ पर पानी भरा एक सरोवर बन गया। तब राजा और उसके हाथी, घोड़े, सैनिक परिवार सहित सबकी प्यास मिट गयी।
अब राजाको भूख लगी। उसके पास खानेके लिए कुछ भी शेष नहीं बचा था। उसने अपने सेवकको पुनः जमदाग्निके आश्रममें भेजा। उस सेवकने वहाँ जाकर कहा ' राजा भूखा है, उसके लिए भोजन चाहिए। ' एकवीराने कहा, ' जाओ, अपने हाथ-पाँव धोकर आओ, भोजन मिल जायेगा। ' एकवीराने स्वर्गसे इन्द्रकी कामधेनु गाय बुलायी। उस गायने अनेक प्रकारके पकवान तैयार कर दिए। राजा आया और परिवार सहित उसने भोजन किया। भोजन करनेके पश्चात राजाने कहा, 'ऐसे पकवान हमारे राज्यमें तो उपलब्ध नहीं हैं। एकवीरा बोली, ' ये सब पकवान इस गायसे प्राप्त हुए हैं। ' राजाने कहा, ' तो यह गाय हमें दे दो। ' वह बोली, ' यह इन्द्रकी कामधेनु है, तुम इसे ले जा सकते हो तो ले जाओ। ' राजा कामधेनुको पकड़कर ले जानेका प्रयत्न करने लगा तो गायने मल-मूत्र कर दिया, जिससे सैनिक, हाथी, और घोड़े उत्पन्न हो गये। दोनों पक्ष परस्पर जूझने लगे। राजा पराजित हो गया। उसने सोचा कि इस ब्राह्मणने यह सब कांड किया है इसलिए उसने जमदाग्नि ऋषि पर तलवारसे प्रहार किये। जमदाग्नि पर घातक प्रहार होते देख एकवीरा उस पर आ गिरी। उसपर भी राजाने अनेक प्रहार किये। राजा अपने सैनिक परिवारको लेकर चला गया। एकवीरा रोरोकर विलाप करने लगी। ' परशुराम दौड़कर आओ 'कहते हुए एकवीराने पुत्रको पुकारा। परशुराम उस समय कैलास पर्वत पर महादेवसे विद्या अध्ययन कर रहा था। एकवीराने जब पुकारा तो महादेवने उससे कहा, ' तुम्हारी माता पर विपत्ति आ गई है, वह तुम्हें बुला रही है।' परशुराम कैलास पर्वत पर ही सारी घटनाका वृतांत जान चुका था। वहाँसे चलते समय वह प्रण करके निकला कि इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियरहित न कर दिया तो मेरा नाम परशुराम नहीं।
जब परशुराम अपनी माता एकवीराके पास पहुँचा तो वह घायल हुई तड़प रही थी, जबकि जमदाग्नि घायल होकर प्राण त्याग चुका था। एकवीराने देह छोडनेसे पूर्व परशुरामसे कहा 'श्री दत्तात्रेयप्रभुजीको आचार्य बनाकर कोरीभूमिमें मेरा अंतिम संस्कार करना।' परशुरामने पूछा ' श्रीदत्तात्रेयप्रभुजीको मैं कैसे पहिचानूँगा ?' 'उनके दर्शन होते ही सूखे काष्टकी बहँगी(काँवर)में से अंकुर निकल आयेंगे ' इतना कहकर माता एकवीराने देहत्याग कर दिया।
परशुरामने माता-पिताके शरीरोंको एक काँवर (बहँगी)के दोनों ओर रखा और उसे कंधो पर लिए वन-उपवन, पर्वत-पहाड़ चारों ओर बहुत घूमा। अंतमें जब वह सह्याद्रि पर्वत पर पहुंचा तो उसे सामनेकी ओर से श्रीदत्तात्रेयप्रभुजी शिकारी(पारधी) वेशमें आते हुए दिखाई दिये। उन्होंने छपाई वाला रेशमी वस्त्र कमर (कटिप्रदेश)में धारणकर रखा था। बायें श्रीकरमें शिकारी कुत्तोंकी जोड़ी और बगलमें घटिका पात्र, दायें श्रीकरमें माँस और सुराकी सुराही, श्रीमुकट पर रस्सीसे बनी टोपी, श्री चरणोंमें दोतल्ले पादत्राण धारणकर रखे थे। उनके साथ एक महिला थी। वह छापे हुए रेशमी वस्त्रकी आगेकी ओर चुन्नट डाले साड़ी(लुगड़ा) और उसीके साथकी चोली पहिने थी। चोलीकी बाजुओंमें गाँठे लगी थीं। उसके केश खुले थे और पाँवोंमें चप्पल पहिने थी। परशुरामने उन्हें देखा तो उसके सुखे काष्ठकी काँवडमें अंकुर नीकल आये। उसने काँवड़ नीचे रख दी और उन्हें दंडवते डालीं। परंतु श्रीदत्तात्रेयप्रभुजी उसे मना करते रहे यह क्या ? तुम ऋषिपुत्र हो, और हम पारधी हैं। यह कहकर श्रीदत्तात्रेयप्रभुजी बारबार निराकरण करते रहे। परशुराम विनीत भावसे प्रार्थना करता रहा। श्रीदत्तात्रेयप्रभुजी विनती स्वीकार नहीं कर रहे थे। साथमें जो आउसा थीं उन्होेंने विनतीकी तब श्रीदत्तात्रेयप्रभुजीने परशुरामकी प्रार्थना स्वीकार की। उसके पश्चात श्रीदत्तात्रेयप्रभुजीने कहा ' परशुराम एकवीराको स्नान करानेके लिए सर्व तीर्थोंसे जल लाना होगा।' परशुरामने विनती की ' जी जी! आपके श्रीचरणोंमें ही सर्वतीर्थ हैं। '
तब श्रीदत्तात्रेय प्रभु जी ने एक स्थान पर चिन्ह लगाया और परशुराम से कहा ' यहाँ बाण मारो।' परशुराम द्वारा बाण मारे जाने पर वहाँसे निर्मल पानीका झरना फूट पड़ा। श्रीदत्तात्रेय प्रभु जी ने उसमें अपने श्रीचरणका अंगूठा प्रक्षालन किया। इस प्रकार उस जल को सर्वतीर्थका महत्व प्राप्त करा दिया। श्री दत्तात्रेय प्रभु जीकी आज्ञासे परशुरामने उस पवित्र जल से माता एकवीराको स्नान कराया। फिर उनकी आज्ञा और आचार्यत्वमें कोरीभूमिमें माता एकवीराका अंतिम संस्कार कराया। श्री दत्तात्रेय प्रभु जी ने उस स्थान पर एक पाषाण रखवाकर सुरा(मद्य)से उसका अभिषेक (स्नान) किया और माँसका उपहार लिखाया। उस पाषाण प्रतिमाको ' भोग पाव ' (तेरा पूजन अर्चन होता रहे ) यह वर दिया।
महदाईसाजीने पूछा ' जी जी ! साथमें जो आउसा थी वह कौन थी ? ' श्रीस्वामीजीने कहा वह परमेश्वरकी मुख्य शक्ति मायामूर्ति थी।
।। जय श्री दत्तात्रेय प्रभु जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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