भगवान श्री कृष्ण जी को छप्पन भोग क्यों लगाते है

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-07-30 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Krishna Prabhu, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1690720200

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

ज्ञान परम्परा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?

स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।

सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।

श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

स्वामींचा परिवार

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
स्वामींचा परिवार तीन प्रकार चा होता:
१) दर्शनीय।
२) बोधवंत (ग्यानी पुरूष तथा भक्त)।
३) अनुसरलेला एकून स्वामीचा परिवार १३५ होता। तो येणे प्रमाणे।

भक्त:
१) पैठनची नागुबाई उर्फ बाईसा
२) वरंगलचे माघव भक्त ब्राह्मण।

बोधवंत (ग्यानी पुरूष):
१) श्री नागदेवाचार्य २) शांतबाईसा ३) महादाईसा ४) म्हाइंभट ५) दायंबा
६) देमाईसा ७) छर्दोबा ८) खेईगोई ९) गोईबाई १०) जोनोउपाध्ये
११) नीळभट भांडारेकार १२) नाथोबा १३) चांगदेव भट

अनुसरलेली:
१) भट (नागदेवाचार्य) २) नीळभट ३) शांताबाईसा ४) महादाईसा ५) म्हाइंभट
६) साधा ७) आऊसा ८) आबाईसा ९) नाथोबा १०) पोमाईसा
११) खेईबाईसा १२) गोईबाईसा

दर्शनीय:
१) रामदेव विद्यावंत वडनेतर २) सारंग पंडित ३) इंद्रभट ४) संतोष ५)अवडळभट
६) अवघूत ७) मार्तंड ८) परसनायक ९)प्रद्न्यासागर १०) माइताहरी
११)घुईनायक १२) रेनाईक १३) गदोनायक १४) पद्मनाभी १५) नागदेव उपाध्ये
१६)राके लक्छमींद्रभट १७) काकोस १८)आनो १९) खळो २०) गोंदो
२१) जपिय विष्णुभट २२) भ्रिंगी २३) वैजोबा २४) काळदासभट २५)वामन
२६) मतिविळासभट २७) नागनायक (डोमेग्राम) २८) भाईदेव २९) उपासनीये ३०) काळबोटे
३१) साईदेव ३२) कान्हो उपाध्ये ३३) काळेवासनायक ३४) गोरे जानोपाध्ये ३५) एकाईसे दोन
३६) देमाईसा ३७) लखुबाईसा ३८) सोभागा ३९) यल्हाइसा ४०) भूतानंद
४१) सामकोसे ४२) ललीताइसा ४३) एकाविराबाईसा ४४) द्रविळाबाईसा ४५) रत्नमाणिका
४६) आबयो ४७) माळी (वडेगाव) ४८) कमळनायक ४९) राणाइसा (रामदेव विद्यावंताची माता) ५०) तथा रामदेवाची शिष्या राणाइसा
५१) वामदेव पैठणकर ५२) बोनुबाया ५३) मेहकरकर बोनु बाइया ५४) प्रंपच विस्मृति घाटे हरिभट ५५) तिवाडी
५६) तथा त्याची पत्नी ५७) ग्रह सारंगपाणी ५८) तथा त्याची माता ५९) महादेव पाठक ६०) महादेव रावसगावकर
६१) तिकवनायक हिरवळीकर ६२) वायनायक रावसगावकर ६३) राहिया (पाटोदा) ६४) गोविंदस्वामी ६५) सारस्वत भट बीडकर
६६) कनासीचा ब्राह्मण ६७) सिंदुर्जनाचा ब्राह्मण ६८) मोसोपवासिनी ६९) राघवदेव ७०) कुंडी कनहरदेव
७१) महादेवोराजा ७२) पाल्हाडांगिया ७३) कास्त हरिदेव पंडित ७४) गोपाळ पंडित पारधी निरोपनीचे ७५) साळीवाहन
७६) राऊत दोघे ७७) मातंग ७८) देईभट तांबुळ ग्रहनीचे ७९) भोग नारायण माय धुवा ८०) मायधुवा
८१) दाको ८२) गणपत आपयो सराळेकर ८३) सुयराची बाई ८४) गोवारीया ८५) पंचगंगा ब्राह्मण
८६) सुकिये जोगनायक ८७) पाठक ८८) यंत्राकार वासुनायक ८९) भाऊ तिकवनायक ९०) गुर्जर दोन्ही
९१) नागा राऊळ ९२) मुंजिया बहिनी ९३) छायागोपाळीची स्त्री ९४)मार्तंड विहिरीचा ब्राह्मण ९५) पाठक देगाऊबाई
९६) वरंगलकर हंसाबाई ९७) घोगरगावकर बाई ९८) धानाई अळजपुर ९९) रामदरणेयाची माता १००) मुक्ताबीई
१०१) रोहेरीचा ब्राह्मण १०२) भोगनारायण ब्राह्मण १०३) ठाकूर मार्या १०४) मल्ल (जोगवटा दान देणारा) १०५) स्वामींनी ज्याला जोगवटा दिला तो ब्राह्मण
१०६) नारोबा १०७) नांदेड येथील गोरक्छण ब्राह्मण १०८) हेडाऊ (आऊसा जवळील डांगरेस नावाचा कुत्रा स्वामींचा भक्त होता)
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

म्हाइंमभट्ट जी का अहंभाव दूर करना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री गोविंद प्रभु राया
एकदिन म्हाइंभट्ट जी ने सर्वज्ञ श्री गोविंद प्रभु जी के लिए अच्छा उपहार तैयार करवाया। तैल मर्दन, स्नानादि क्रियाके पश्चात श्रीप्रभु सर्वज्ञ को बहुमूल्य वस्त्र पहनाया गया। प्रसन्नतावश उस किमती बहुमूल्य वस्त्रको पहने सर्वज्ञ आनंदसे आगनमें इधर-उधर घुम रहे थे, तो सर्वज्ञ श्रीगोविंदप्रभुबाबाकी प्रसन्नता देखकर *म्हाइंमभट्टजीको अहंभाव जागृत हो उठा की यह मैं ही म्हाइंमभट्ट हूं, जीसका इतना बहुमूल्य किमती वस्त्र श्रीप्रभुबाबा स्वीकार कर रहे है !!! घट घटके जाननहार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे भला म्हाइंमभट्टके मनमें जागृत हुई इस अहंभावना कैसे छुपी रह सकती। उसे जान तत्काल उस वस्त्र उतार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबाने दूसरा वस्त्र पहन लिया, और उस वस्त्र पर पाद प्रहार कर बोले- अरे पगले व्यर्थमें ही इसकी बड़ाई कर रहा है! इसे अभी हम फाड देंगे!' कहकर उस वस्त्रको इधर-उधर घसीटने लगे। उस समय श्रीसर्वज्ञके सन्मुख जानेकी कीसी को हिम्मत नहीं हो रही थी जिससे उन्हें विनंतीकी जाय।

तब श्रीआचार्यजीने म्हाइंमभट्ट जी से पूछा, ' म्हाइंमभट्ट! क्या तुमने मनमें कोई कल्पना तो नहीं की ?' उत्तरमें म्हाइंमभट्टजी बोले, 'हां ! आचार्य! मैंने वस्त्र के संबंधमें कल्पना कर संतोष अनुभव कर रहा था।

आचार्यजी समझाते हुए बोले, 'भट्टजी, हम जीवोंके पास है ही क्या, जो हम परमेश्वरको समर्पित कर सकें? तुमने किया ही क्या था? की मनमें इतना संतोष मान बैठे? अब सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते नमस्कार डालीये !!!!!।

तब म्हाइंमभट्टजीने साष्टांग नमस्कार डालते आर्तभरे स्वरमें सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते प्रार्थना करते विनंती की- 'हे भगवन् मैं अपराधी हूं, मैंने अहंभाववश मनमें व्यर्थकी कल्पना की थी, मेरे इस अपराधके लिए मुझे क्षमा किजीये श्रीप्रभु राया। आपके सम्मुख वह वस्त्र है ही क्या? किंतु! अज्ञानतावश मैं यह जान ही न सका। मेरी यह अबुधताके लिए मुझे क्षमा किजिए !!!!!' यह कहकर वे रो पडे तो करुणाधन सर्वज्ञ श्रीप्रभु राया का दिल पसीज उठा। प्रसन्न होकर श्रीराया बोले,' अरे पगले! उठ जा ! उठ जा, जल्दी, क्यों नहीं उठ रहा ! पगले! अब तो तुम मेरे और भी अधिक प्रिय बन गये हो!

म्हाइंमभट्टजी उठकर वह वस्त्र ले आये तो सर्वज्ञ श्रीप्रभुरायाने उसको पुनः पहन लिया। कुछ दिनोंतक श्रीप्रभुबाबाके पहननेके पश्चात म्हाइंमभट्टजीने उस वस्त्र को धोनेके लिए दे दिया। उसके पश्चात सर्वज्ञ श्रीप्रभुराया उस वस्त्रको प्रतिदिन पहनते ही रहे।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी महाराज...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

पूर्वार्ध:-
🌸 १) पैठण.. शके ११९०, रवि ०७.१०.१२६८
🌸 २) सिन्नर.. शके ११९१, शनि २६.१०.१२६९
🌸 ३) बिड.. शके ११९२, बुध, १५.१०.१२७०
🌸 ४) जालना.. शके ११९३, सोम ०५.१०.१२७१

उत्तरार्ध:-
🌸 ५) डोमेग्राम.. शके ११९४, शनि २२.१०.१२७२
🌸 ६) नेवासा.. शके ११९५, बुध ११.१०.१२७३
🌸 ७) पैठण.. शके ११९६, सोम ०१.१०.१२७४
🌸 ८) आंबा [शेकटा].. शके ११९७, रवि २०.१०.१२७५

महात्माओं की दीवाली:-
एक दिन महदाइसाने भगवानसे प्रार्थना की, ‘महाराज ! मैं आपकी सेवामें दीवालीका त्यौहार मनाऊँगी।’ भगवानने आज्ञा दी, ‘हमारे साथ महात्मालोगोंकी भी दीवाली मनायी जाये। त्यौहार मनानेका सामान यदि कम हो, तो नागुबाइसासे माँग लो।’

महदाइसाने ‘जो आज्ञा’ कहकर सबको स्नान करानेके लिये संध्याके समय ही पानी भर लिया। उमाइसाके घरसे उबटन, तेल तथा साबुन ले आयी। उस दिन भगवान बहुत सवेरे उठकर शौच आदिसे निवृत्त होकर आसनपर आ बैठे। भक्तलोगोंको भी बैठाया गया। महदाइसाने भक्त तथा भगवानकी आरती उतारी और भगवानको वीड़ा दिया। महदाइसाने भगवानके शरीरपर उबटन मला। उस कटोरीमें और तेल डालकर उसने भक्तोंको दिया। उन्होंने उबटनसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरका मर्दन किया। उसने भगवानके सिरपर तेलकी मालिश की। भगवानको ऊँचे चबूतरेपर बिठलाया गया। नारियलके दूधसे उनका सिर धोया गया। भक्तजनोंको भी हरे नारियलका दूध सिरमें लगानेको दिया गया। उन्होंने एक-दूसरेके सिरपर मल लिया। फिर भगवानको जलसे नहलाया गया। महदाइसा पानी डाल रही थी और बाइसाजी सिर तथा शरीरको मल रही थी। भक्तलोग चबूतरेके नीचे खड़े होकर उस पानीसे नहा रहे थे। अंतमें जब भगवानकी श्रीमूर्तिपर पानीकी धार डाली गयी, तो भगवानने दोनों हाथ सिरपर रख लिये। पानी कुहनियोंसे होकर बहने लगा। उस पानीसे भक्तजन नहाये। इस प्रकार भगवान तथा भक्तोंको स्नान करवाया गया ।

शरीरपर बाल अधिक होनेके कारण नागदेवजीको और अलग पानी देकर नहलाया गया। महदाइसाने कुछ वस्तुएँ लेकर भगवानके सिरसे वार दीं। उसके पश्चात भगवानने वस्त्र पहिन लिये। भगवानको आसनपर बिठलाकर उनकी पूजा की गयी। सभीको चंदनका तिलक लगाया गया। पुनश्च सभीके सिरपरसे कुछ वस्तुएँ वार दी गयीं। भगवानको वीड़ा और भक्तजनोंको पान दिये गये। भगवानने सबको पान खानेकी आज्ञा दी। सबने पान खाये। उतनेमें अरुणोदय हो जानेपर बाइसाजीने दैनिक पूजाअवसर किया। बादमें भगवान विहरणके लिये चले गये और महदाइसा भोजन बनानेमें लग गयी ।

विहरणसे भगवानके लौटनेपर महदाइसाने पूजाअवसर किया। भगवानके लिये थाल और भक्तोंके लिये पत्तलें परोसी गयीं। भगवानके साथ बैठकर सब भक्तजनोंने भोजन किया। इस प्रकार दीपावली मनायी गयी ।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

नृत्य देखना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान श्रीचक्रधर स्वामीजी चांगदेव मंदिरके पिछले हिस्सेमें बैठे थे। उतनेमें एक नर्तक मंडली वहाँ नृत्य करने आ पहुँची। उनमेंसे एक स्त्री वस्त्र बदलने जब मंदिरके पीछे आयी, तो उसने वहाँ भगवानको विराजमान देखा। वह भगवानके असीम सौंदर्यपर मनोमुग्ध हो आत्मविस्मृत-सी हुई निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर टुकुरटुकुर ताकती रही। जब काफी देर बाद भी वह वापस न आयी, तो दूसरे नर्तक भी उसे खोजते खोजते वहाँ जमा हो गये और भगवानके देदीप्यमान सौंदर्यको देख अपनी सुधबुध खो बैठे। उनको अपने पास एकत्रित हुआ देख भगवानने उनसे कहा, 'आप सब अंदर चलकर नृत्यकी तैयारी करो, हम वहीं आते हैं।'
भगवानके इन शब्दोंसे उनकी तंद्रा टूटी, तो उन्होंने अपनेआपको विमोहितसा पाया। उनकी आज्ञानुसार वे सब मंदिर में जाकर नृत्यकी तैयारीमें लग गये। थोड़ी देर बाद भगवान भी मंदिरमें जा पहुँचे। सबने भगवानको अपनीअपनी कला दिखायी। भगवानने सबकी कलाकी भूरिभूरि प्रशंसा की तथा उन्हें प्रसाद रूप में पान खिलाये। जानेसे पूर्व उन्होंने कहा, 'महाराज, आपकी श्रीमुर्तिके दर्शनसे हमें बड़ा आनंद प्राप्त हुआ है। ऐसा आनंद, जिसको हम शब्दोंमें व्यक्त नहीं कर सकते। आजकल तो कलाका कोई सच्चा पारखी है ही नहीं। आपने हमें जो प्रोत्साहन दिया है, उससे भी हमें बड़ा बल मिला है।'
एक दूसरी नर्तकीने आगे बढ़कर प्रार्थना की, 'महाराज, यदि आपको कष्ट न हो, तो भोजन करने आप हमारे यहाँ ही चलें।'
प्रत्युत्तरमें भगवानने कहा, 'हमें आज कहीं अन्यत्र आमंत्रण है, इसलिये तुम्हारे साथ नहीं चल सकते। हाँ, फिर कभी तुम्हारे अनुरोधको हम जरूर पूर्ण करेंगे।'
सबके चले जानेपर भगवान भी अपने निवास स्थानपर लौट आये।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

कामाख्या के निमित्त देह त्यागना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रपाणि प्रभु जी
कौलि नामक ग्राम में एक हट योगिनी रहा करती थी जिसका नाम था कामाख्या, उसने अपने सौन्दर्य तथा अपने हाव् भाव से अनेक साधु संतो को अपने तप मार्ग से प्रवृत्त किया था। श्री चक्रपाणि महाराज जी के सामर्थ की परिस्थिति सुन बह भी वह आ पहुंची। अपने रंग रूप और हाव् भाव से वो प्रभु जी पर डोरे डालने लगी। श्री चक्रपाणि महाराज जी ने ब्रह्मचर्य धारण किआ था और प्रभु जी अपनी गुफा में ही ध्यान लगाए बैठे थे। कामाख्या गुफा में प्रवेश करना चाहती थी परन्तु बह प्रभु जी द्वारा श्री दत्तात्रय प्रभु जी की दी हुई कसम के कारन अंदर ना जा सकी।
कामाख्या गुफा के भर से ही अनेक प्रकार की स्तुति और प्राथना करती रही और अपने हाव् भाव से कोशिश करती रही परन्तु कोई भी प्रभु जी असर न पड़ा और बह अपने मार्ग से हुए। इसी प्रकार ७ दिन बिट गए और कामाख्या गुफा के दरवार में बैठी रही। अंत में श्री चक्रपाणि जी ने योग सामर्थ्य से अपना देह त्याग दिया। सातवे दिन कामाख्या ने गुफा में प्रवेश किआ तो देखा की प्रभु जी अपना शरीर छोड़ चुके थे। प्रभु जी की प्रसंशा करते हुए उसने खा की अनेक प्रकार के महा पुरषो को अपने वश करा मेने किन्तु प्रभु जी सामर्थ्यवान थे अंत अपने शरीर का त्याग किया।
।। जय श्री चक्रपाणि महाराज जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more