म्हाइंमभट्ट जी का अहंभाव दूर करना

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-10-22 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Govind Prabhu, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1697977800

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

भगवान श्री कृष्ण जी को छप्पन भोग ...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है। इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है। यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है।
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया:
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी। अर्थात् बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे। जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ। भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया।

गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग:
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों। श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी। व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया।
छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं। उस कमल की तीन परतें होती हैं…प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह” और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं। इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
Read more

ज्ञान परम्परा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?

स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।

सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।

श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तर...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तरफ आ रहे थे तभी एक विद्यावंत सुंदर वस्त्र पहने और माथे पर तिलक लगाए आगे आने लगे! भगवान जी ने उन्हें देखा और द्वार के पास पहुंच नागदेव जी को आज्ञा दी कि उस विद्यावंत पुरुष को वापिस भेज दिया जाए! नागदेव उनके पास गए और कहने लगे, क्या हो गया है इस टोलगी को? विद्यावंत होकर गा रहे हो? यहां कोई दान करने वाला बैठा है क्या?

फिर वह विधावंत व्यक्ति चला गया! उसकी जाने के बाद भगवान जी ने नागदेव जो को कहा, तुम महात्मा होकर ऐसे अपमान भरे शब्द कैसे बोल गए? उसे आराम से भेजने को कहा था न कि अपशब्द बोलने को! यहां कोई दानी नहीं बैठा क्या? फिर हम कौन हैं? साधक को परमेश्वर की मानसिक प्रवृति को भंग नहीं करनी चाहिए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

हमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)

|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)

|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)

|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)

|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी महाराज...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

पूर्वार्ध:-
🌸 १) पैठण.. शके ११९०, रवि ०७.१०.१२६८
🌸 २) सिन्नर.. शके ११९१, शनि २६.१०.१२६९
🌸 ३) बिड.. शके ११९२, बुध, १५.१०.१२७०
🌸 ४) जालना.. शके ११९३, सोम ०५.१०.१२७१

उत्तरार्ध:-
🌸 ५) डोमेग्राम.. शके ११९४, शनि २२.१०.१२७२
🌸 ६) नेवासा.. शके ११९५, बुध ११.१०.१२७३
🌸 ७) पैठण.. शके ११९६, सोम ०१.१०.१२७४
🌸 ८) आंबा [शेकटा].. शके ११९७, रवि २०.१०.१२७५

महात्माओं की दीवाली:-
एक दिन महदाइसाने भगवानसे प्रार्थना की, ‘महाराज ! मैं आपकी सेवामें दीवालीका त्यौहार मनाऊँगी।’ भगवानने आज्ञा दी, ‘हमारे साथ महात्मालोगोंकी भी दीवाली मनायी जाये। त्यौहार मनानेका सामान यदि कम हो, तो नागुबाइसासे माँग लो।’

महदाइसाने ‘जो आज्ञा’ कहकर सबको स्नान करानेके लिये संध्याके समय ही पानी भर लिया। उमाइसाके घरसे उबटन, तेल तथा साबुन ले आयी। उस दिन भगवान बहुत सवेरे उठकर शौच आदिसे निवृत्त होकर आसनपर आ बैठे। भक्तलोगोंको भी बैठाया गया। महदाइसाने भक्त तथा भगवानकी आरती उतारी और भगवानको वीड़ा दिया। महदाइसाने भगवानके शरीरपर उबटन मला। उस कटोरीमें और तेल डालकर उसने भक्तोंको दिया। उन्होंने उबटनसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरका मर्दन किया। उसने भगवानके सिरपर तेलकी मालिश की। भगवानको ऊँचे चबूतरेपर बिठलाया गया। नारियलके दूधसे उनका सिर धोया गया। भक्तजनोंको भी हरे नारियलका दूध सिरमें लगानेको दिया गया। उन्होंने एक-दूसरेके सिरपर मल लिया। फिर भगवानको जलसे नहलाया गया। महदाइसा पानी डाल रही थी और बाइसाजी सिर तथा शरीरको मल रही थी। भक्तलोग चबूतरेके नीचे खड़े होकर उस पानीसे नहा रहे थे। अंतमें जब भगवानकी श्रीमूर्तिपर पानीकी धार डाली गयी, तो भगवानने दोनों हाथ सिरपर रख लिये। पानी कुहनियोंसे होकर बहने लगा। उस पानीसे भक्तजन नहाये। इस प्रकार भगवान तथा भक्तोंको स्नान करवाया गया ।

शरीरपर बाल अधिक होनेके कारण नागदेवजीको और अलग पानी देकर नहलाया गया। महदाइसाने कुछ वस्तुएँ लेकर भगवानके सिरसे वार दीं। उसके पश्चात भगवानने वस्त्र पहिन लिये। भगवानको आसनपर बिठलाकर उनकी पूजा की गयी। सभीको चंदनका तिलक लगाया गया। पुनश्च सभीके सिरपरसे कुछ वस्तुएँ वार दी गयीं। भगवानको वीड़ा और भक्तजनोंको पान दिये गये। भगवानने सबको पान खानेकी आज्ञा दी। सबने पान खाये। उतनेमें अरुणोदय हो जानेपर बाइसाजीने दैनिक पूजाअवसर किया। बादमें भगवान विहरणके लिये चले गये और महदाइसा भोजन बनानेमें लग गयी ।

विहरणसे भगवानके लौटनेपर महदाइसाने पूजाअवसर किया। भगवानके लिये थाल और भक्तोंके लिये पत्तलें परोसी गयीं। भगवानके साथ बैठकर सब भक्तजनोंने भोजन किया। इस प्रकार दीपावली मनायी गयी ।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

एक दिन महदाइसा ने श्री चकर्धर स्व...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी जी ने उत्तर दिया, महदाइसा! जब भगवन श्री कृष्ण जी राजा कंस का वध करके कारागर की ओर जाने लगे तो वहा देखा की उद्धव देव भयभीत स्तम्भ के पीछे खड़े थे।
श्री कृष्ण जी ने उन्हें छिपा देख कर कहा, अरे! वहा कूँ खड़ा है। उतर देते हुए अन्य सेवक ने कहा। प्रभु जी वहा पर राजा कंस के प्रधान मंत्री है। तत्काल उद्धव ने कहा, प्रभु जी में अपनी बुद्धि से कुछ मंत्रणा कंस के समुख रखा करता था। तब प्रभु जी ने कहा, आपने आजतक कंस का अमात्यतव सवीकारा था, अब आजसे आप हमारा मंत्रितब धारण करो ओर हमे मंत्रणा दिया करो।
प्रभु जी के इन्ही वचनों के साथ उद्धव देव को प्रेम संक्रमण हुआ ओर उन्होंने प्रभु जी को सहस्तांग दंडवत प्रणाम कर, खुदको धन्य माना|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more