लाहीभट्टकी श्रवणजिज्ञासा

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-10-15 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1697373000

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

सबको अपने जैसा जानो

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
नियमानुसार एक दिन आश्रमकी देखभाल आउसा कर रही थी। एक कुत्तेको आया देखकर उसने उसे पत्थर मारा। पत्थर लगते ही कुत्ता चिल्लाता हुआ पूँछ दबाकर बाहरकी ओर भाग गया। कुत्तेका रोना था कि उधर भगवान दोनों हाथोंमें अपना मस्तक थामकर बैठ गये।
भगवानको श्रीमुकुट थामे देख आउसाका रंग उड गया। वह भागकर उनके पास जा पहुँची। उसने अकुलाकर खिन्न मनसे पूछा - 'महाराज! मैंने मारा तो कुत्तेको है, आप कयों मस्तक थामकर बैठ गये हैं ?'
भगवानने समझाया - 'आउसा ! ईश्वरस्वरूप सर्वत्र व्यापक है। किसी जीव पर किये प्रहारका इसीलिये वह अनुभव करता है। तुमने उस प्राणीको पत्थर मारा, उसकी पीड़ा हमें हुई, इसीलिए हमने मस्तक थाम लिया।' फिर उन्होंने कुछ थमकर पूछा - 'बताओ तो तुमने उसे मारा कयों है ?'
आउसाने उत्तर दिया, 'महाराज! कल यही कुत्ता नागदेवके भिक्षान्नकी झोली उठा ले गया था। आज यह पुनः कुछ उठानेकी नीयतसे आया था। यदि मैं इसे न मारती, तो यह अवश्य ही आज भी कुछ ले भागता। अतः मैंने उसे समुचित दंड दिया है , तो कोई अपराध नहीं किया।'
भगवानने कहा, 'आउसा ! मनुष्यके समान इसे पकाकर खिलानेवाला तो कोई है नहीं, जहाँ जाकर यह आरामसे खायेगा। इस बेचारेने तो इसी तरह घूम-फिरकर पेट भरना है। तुम अपनी चीजोंको सम्भालकर रखो, उसके लिए इसे क्यों दंडित करती हो ? यह तो खुद तुम्हारा दोष है। इस तरह वस्तुओंको असुरक्षित रखोगी, तो यह तो मुँह मारेगा ही।'
भगवानके उदात्त विचारोंके आगे आउसा नतमस्तक हो गई और उसने *अपने अपराधकी क्षमा माँगकर पुनः वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा ली।
।। जय श्री चक्रधर जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची | उ...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची तब क्या देखती हैं कि यहां का पानी भी अन्य स्थानों की तरह ही है! कोई विशेष नहीं! बहुत पछतावा कर दादोस के कारण दुखी हो रही थी! मन को समझा कर उन्होंने गंगा में स्नान किया! सबसे पहले दादोस को तिलांजलि दी! फिर अपने परिवार और गोत्र को भी तिलांजलि दी! इसके बाद स्नान कर बाजार आई और अत्यंत दुर्बल नंगे व्यक्ति को भोजन करवाया! उस व्यक्ति को अधिक भूख लगी थी तो वह अतिरिक्त दो लोगों का भोजन भी खा गया! उसके जाने के बाद महादाईसा जी रिद्धपुर के लिए निकली!

यहां से भगवान की ने बाईसा माताजी और नागदेव की को भी परमेश्वर पुर भेजा हुआ था! वे श्री गोविंद प्रभु जी के दर्शन कर वापिस श्री चक्रधर स्वामी जी के पास चलपड़े! भगवान से उन्हें माईतया के घर भेंट हुई!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

एक दिन महदाइसा ने श्री चकर्धर स्व...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी जी ने उत्तर दिया, महदाइसा! जब भगवन श्री कृष्ण जी राजा कंस का वध करके कारागर की ओर जाने लगे तो वहा देखा की उद्धव देव भयभीत स्तम्भ के पीछे खड़े थे।
श्री कृष्ण जी ने उन्हें छिपा देख कर कहा, अरे! वहा कूँ खड़ा है। उतर देते हुए अन्य सेवक ने कहा। प्रभु जी वहा पर राजा कंस के प्रधान मंत्री है। तत्काल उद्धव ने कहा, प्रभु जी में अपनी बुद्धि से कुछ मंत्रणा कंस के समुख रखा करता था। तब प्रभु जी ने कहा, आपने आजतक कंस का अमात्यतव सवीकारा था, अब आजसे आप हमारा मंत्रितब धारण करो ओर हमे मंत्रणा दिया करो।
प्रभु जी के इन्ही वचनों के साथ उद्धव देव को प्रेम संक्रमण हुआ ओर उन्होंने प्रभु जी को सहस्तांग दंडवत प्रणाम कर, खुदको धन्य माना|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

उत्तरार्ध लीला क्रमांक 206 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
किसी दिन सुबह का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी छिन्नस्थली स्थान की तरफ गए! गुफा में आकर महाराज ने नाथोबा और नागदेव जी के सिर आपस में मिला दिए और स्थिति सुख अनुभव करवाया! स्वयं वापिस लौट आए तो बाईसा माताजी ने उन दोनों के विषय में पूछा! तब भगवान जी ने कहा, वे दोनों आपस में भिड़े हुए हैं! जाओ उन्हें ले आओ! बाईसा माताजी नाथोबा और नागदेव जी को बुला लाई! उन दोनों ने आकर स्थिति सुख का आनंद लेने के विषय में भगवान जी को बताया! स्वामी जी कहने लगे, अभी तो हमसे प्राप्त हुआ स्थिति सुख आपको इतना आनंद दे रहा है तो सोचो हमारा परमानंद आपको कितना प्रफुल्लित करेगा! इसका आपको आभास भी नहीं है!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

ज्ञान परम्परा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?

स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।

सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।

श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

🌸 बिना भाग्य जो वस्तु ईश्वर अवतार देते है वह लिला ज्ञान कहलाता है।
🌸 अवतार के सम्बन्ध से जो फल प्राप्त होता है वह सम्बन्धदान है।
🌸 जोवो के कर्मों को ग्रहण कर उन्हे सीघ्रता से भुगवाने को ग्रहणा दान कहते है।
🌸 ईश्वर स्वरूप की प्राप्ती होना यह कैवल्यदान कहलाता है।

ईस प्रकार ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के दान दिये जाते है।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more