वज्री की लीला

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2024-01-21 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1705840200

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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उत्तरार्ध लीला क्रमांक 206 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
किसी दिन सुबह का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी छिन्नस्थली स्थान की तरफ गए! गुफा में आकर महाराज ने नाथोबा और नागदेव जी के सिर आपस में मिला दिए और स्थिति सुख अनुभव करवाया! स्वयं वापिस लौट आए तो बाईसा माताजी ने उन दोनों के विषय में पूछा! तब भगवान जी ने कहा, वे दोनों आपस में भिड़े हुए हैं! जाओ उन्हें ले आओ! बाईसा माताजी नाथोबा और नागदेव जी को बुला लाई! उन दोनों ने आकर स्थिति सुख का आनंद लेने के विषय में भगवान जी को बताया! स्वामी जी कहने लगे, अभी तो हमसे प्राप्त हुआ स्थिति सुख आपको इतना आनंद दे रहा है तो सोचो हमारा परमानंद आपको कितना प्रफुल्लित करेगा! इसका आपको आभास भी नहीं है!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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सबको अपने जैसा जानो

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
नियमानुसार एक दिन आश्रमकी देखभाल आउसा कर रही थी। एक कुत्तेको आया देखकर उसने उसे पत्थर मारा। पत्थर लगते ही कुत्ता चिल्लाता हुआ पूँछ दबाकर बाहरकी ओर भाग गया। कुत्तेका रोना था कि उधर भगवान दोनों हाथोंमें अपना मस्तक थामकर बैठ गये।
भगवानको श्रीमुकुट थामे देख आउसाका रंग उड गया। वह भागकर उनके पास जा पहुँची। उसने अकुलाकर खिन्न मनसे पूछा - 'महाराज! मैंने मारा तो कुत्तेको है, आप कयों मस्तक थामकर बैठ गये हैं ?'
भगवानने समझाया - 'आउसा ! ईश्वरस्वरूप सर्वत्र व्यापक है। किसी जीव पर किये प्रहारका इसीलिये वह अनुभव करता है। तुमने उस प्राणीको पत्थर मारा, उसकी पीड़ा हमें हुई, इसीलिए हमने मस्तक थाम लिया।' फिर उन्होंने कुछ थमकर पूछा - 'बताओ तो तुमने उसे मारा कयों है ?'
आउसाने उत्तर दिया, 'महाराज! कल यही कुत्ता नागदेवके भिक्षान्नकी झोली उठा ले गया था। आज यह पुनः कुछ उठानेकी नीयतसे आया था। यदि मैं इसे न मारती, तो यह अवश्य ही आज भी कुछ ले भागता। अतः मैंने उसे समुचित दंड दिया है , तो कोई अपराध नहीं किया।'
भगवानने कहा, 'आउसा ! मनुष्यके समान इसे पकाकर खिलानेवाला तो कोई है नहीं, जहाँ जाकर यह आरामसे खायेगा। इस बेचारेने तो इसी तरह घूम-फिरकर पेट भरना है। तुम अपनी चीजोंको सम्भालकर रखो, उसके लिए इसे क्यों दंडित करती हो ? यह तो खुद तुम्हारा दोष है। इस तरह वस्तुओंको असुरक्षित रखोगी, तो यह तो मुँह मारेगा ही।'
भगवानके उदात्त विचारोंके आगे आउसा नतमस्तक हो गई और उसने *अपने अपराधकी क्षमा माँगकर पुनः वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा ली।
।। जय श्री चक्रधर जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
🌸 दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमाने संपुर्ण शरणागती
🌸 दंडवत हा शब्द प्राचीन ग्रंथ रचनेत सुद्धा आला आहे
🌸 दंडवत दोन प्रकारे केल्या जातो ,एक वाचिके कायाप्रणीत कंबरेपासुन वाकुन दंडवत बोलने
🌸 दुसरा दंडवत संपुर्ण शरीर जमीनीवर काठिवत् टाकने
🌸 लीळाचरीत्रात बाईसा राशी दंडवत् घालत होत्या स्वामींच्या दर्शनाला आलेले भक्तजन पाच दंडवत घालुन श्रीचरणी लागत, स्वामी चांगदेव भटाला रिद्दपुरला गेल्यावर घाला घाला दंडवत म्हटले
🌸 आपण सुद्दा स्थानाला गेल्यावर प्रथम बाहेर पाच दंडवत घालुन त्या स्थानाची लीळा आठवावी,नंतर हात सोवळे करुण स्थान वंदन करावे पुनश्च संपुर्ण विधी झाल्यावर दंडवत घालुन मंदिराच्या बाहेर पडावे
🌸 दंडवत घातल्याने जीव स्वरुपी आलेला आसळगै ,पातलेपणा निघुन जातो व साधक विधी करण्यास दक्ष होतो
🌸 दंडवताने रोग नाहिसे होतात ,कारण दंडवत हा एक ऊत्तम व्यायाम आहे,वाय,कफ,पित्त बाधत नाहित
🌸 दंडवत घालताना लीळाचरीत्रातील दंडवताच्या लिळा आठवल्याने जीव स्वरुपाची योग्यता वाढते ईत्यादि अनेक फायदे आहेत
🌸 परमेश्वराच्या सर्व साधकाने एकमेकांना भेटल्यावर वाकुन ,नम्रतेने ,श्रद्धेने आवडिने दंडवत केला तर स्वामी भेटलेयाचे गोमटे होते

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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ज्ञान शक्ती स्वीकार

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

इधर श्री चक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से (श्री दत्तात्रेय प्रभु) वाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्री चक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्री चक्रपाणी प्रभु श्री दत्तात्रेय प्रभु के (वाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी वाघने (श्री दत्तात्रेय प्रभु) श्री चक्रपाणी के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की, श्री चक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ “पराशक्ती” के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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हमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)

|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)

|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)

|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)

|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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वज्री की लीला

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
बेलापुर के आदित्य मंदिर का आँगन। प्रातःकाल का समय। महदाइसा को कुछ घिसने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। उत्सुकता से भर वह बाहर आकर देखती है।

क्या देखती है कि सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी दोनों श्रीचरणों में टिकाए एक पत्थर पर एक काले रंग की ईंट (वज्री) को घिस रहे हैं। अपने उत्तरीय से वे अपना शीर्ष ढंके हुए हैं। अंगिए की बाँहें उन्होंने ऊपर की हुई हैं।

कुतूहल से भर महदाइसा निकट आ खड़ी होती है। चुपचाप। स्वामीजी व्यस्त हैं। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं। सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही हैं।

महदाइसा को कुछ समझ नहीं आती कि स्वामीजी क्या कर रहे हैं? वह जाती है और जाकर नागदेव को बुला लाती है।

कुछ घिस जाने पर स्वामीजी उस वज्री को उलटपलट कर देखते हैं। सही हो गई कि नहीं? सही न पा उसे फिर घिसने लगते हैं।

जब महदाइसा-नागदेव को कुछ समझ नहीं पड़ा तो उनसे रहा नहीं गया। महदाइसा ने तन्मयता भंग करते पूछ ही लिया, 'जी जी: यह आप क्या कर रहे हैं?' पीछे मुड़ स्वामीजी बोले, 'बाई, यह हमने एक वज्री गढ़ी है!

वज्री अर्थात् वारितुरंग। जल में तैरनेवाला घोड़ा, जो पानी से घिरे द्वीप में रहता है और उसमें तैर लेता है। डूबता नहीं। उसे वारितुरंग कहते हैं। उसी की तरह हमने अपने हाथों यह वज्री गढ़ी है। यह सदा पानी में तैरती रहेगी। कभी डूबेगी नहीं।

यह कहते स्वामीजी ने वह वज्री सामने करते दोनों को दिखाई

बरसों बाद महदाइसा ने इसी अनुपम लीला का स्मरण करतेकरते नौगाँव में अपने अंतिम श्वास छोड़े।

ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस लीला का नित्य स्मरण जीव को अवश्यमेव इस संसार-सागर से पार करा देता है। जन्ममरण के चक्र से मुक्त करा देता है।

प्रतिदिन प्रातःकाल के स्मरण में इस फलदायक लीला को अवश्य अपने ध्यान में लाएँ।

सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी की सदा ही जय हो!
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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