श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-11-19 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Dattatreya Prabhu, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1700397000

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

म्हाइंमभट्ट जी का अहंभाव दूर करना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री गोविंद प्रभु राया
एकदिन म्हाइंभट्ट जी ने सर्वज्ञ श्री गोविंद प्रभु जी के लिए अच्छा उपहार तैयार करवाया। तैल मर्दन, स्नानादि क्रियाके पश्चात श्रीप्रभु सर्वज्ञ को बहुमूल्य वस्त्र पहनाया गया। प्रसन्नतावश उस किमती बहुमूल्य वस्त्रको पहने सर्वज्ञ आनंदसे आगनमें इधर-उधर घुम रहे थे, तो सर्वज्ञ श्रीगोविंदप्रभुबाबाकी प्रसन्नता देखकर *म्हाइंमभट्टजीको अहंभाव जागृत हो उठा की यह मैं ही म्हाइंमभट्ट हूं, जीसका इतना बहुमूल्य किमती वस्त्र श्रीप्रभुबाबा स्वीकार कर रहे है !!! घट घटके जाननहार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे भला म्हाइंमभट्टके मनमें जागृत हुई इस अहंभावना कैसे छुपी रह सकती। उसे जान तत्काल उस वस्त्र उतार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबाने दूसरा वस्त्र पहन लिया, और उस वस्त्र पर पाद प्रहार कर बोले- अरे पगले व्यर्थमें ही इसकी बड़ाई कर रहा है! इसे अभी हम फाड देंगे!' कहकर उस वस्त्रको इधर-उधर घसीटने लगे। उस समय श्रीसर्वज्ञके सन्मुख जानेकी कीसी को हिम्मत नहीं हो रही थी जिससे उन्हें विनंतीकी जाय।

तब श्रीआचार्यजीने म्हाइंमभट्ट जी से पूछा, ' म्हाइंमभट्ट! क्या तुमने मनमें कोई कल्पना तो नहीं की ?' उत्तरमें म्हाइंमभट्टजी बोले, 'हां ! आचार्य! मैंने वस्त्र के संबंधमें कल्पना कर संतोष अनुभव कर रहा था।

आचार्यजी समझाते हुए बोले, 'भट्टजी, हम जीवोंके पास है ही क्या, जो हम परमेश्वरको समर्पित कर सकें? तुमने किया ही क्या था? की मनमें इतना संतोष मान बैठे? अब सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते नमस्कार डालीये !!!!!।

तब म्हाइंमभट्टजीने साष्टांग नमस्कार डालते आर्तभरे स्वरमें सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते प्रार्थना करते विनंती की- 'हे भगवन् मैं अपराधी हूं, मैंने अहंभाववश मनमें व्यर्थकी कल्पना की थी, मेरे इस अपराधके लिए मुझे क्षमा किजीये श्रीप्रभु राया। आपके सम्मुख वह वस्त्र है ही क्या? किंतु! अज्ञानतावश मैं यह जान ही न सका। मेरी यह अबुधताके लिए मुझे क्षमा किजिए !!!!!' यह कहकर वे रो पडे तो करुणाधन सर्वज्ञ श्रीप्रभु राया का दिल पसीज उठा। प्रसन्न होकर श्रीराया बोले,' अरे पगले! उठ जा ! उठ जा, जल्दी, क्यों नहीं उठ रहा ! पगले! अब तो तुम मेरे और भी अधिक प्रिय बन गये हो!

म्हाइंमभट्टजी उठकर वह वस्त्र ले आये तो सर्वज्ञ श्रीप्रभुरायाने उसको पुनः पहन लिया। कुछ दिनोंतक श्रीप्रभुबाबाके पहननेके पश्चात म्हाइंमभट्टजीने उस वस्त्र को धोनेके लिए दे दिया। उसके पश्चात सर्वज्ञ श्रीप्रभुराया उस वस्त्रको प्रतिदिन पहनते ही रहे।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

हमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)

|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)

|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)

|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)

|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

श्री गोविन्द प्रभु महाराज जी के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

गोविन्द प्रभु भगवान जी के अवतारोत्सव पर हम जितने पदार्थ बनने में सक्षम है उतने पदार्थ बना का प्रभु जी को को भोग लगाना चाहिए।
1 - लाख की भाकर, गुड़ की रोटियां, दलिया
2 - दही दूध और माखन, श्री खंड, गुलाब जामुन
3- पकोड़े (बुड़ुदे), धिडरे (बेसन से बना हुआ पुडा), काजू
4 - गुड़, गुड़ और भुने चने, कच्चे ज्वार के दाने
5 - देसी घी, मक्खन, गुड़ और देसी घी से बनी सेवइयां
6 - मीठी ककड़ी, दही भल्ले, खीर
7 - बैंगन की सब्जी, साग
8 - तरबूज, बेर, संतरे, आम का रस
9 - आउसा जी का प्रसिद्ध हलवा

इत्यादि पदार्थ भगवान जी को अच्छे लगते थे।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
Read more

उत्तरार्ध लीला क्रमांक 205 | लीला...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
फिर किसी दिन रात का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी आंगन में शत्पदी करते हुए चांदनी रात की तरफ इशारा करने लगे! भगवान जी की इच्छा थी कि कहीं बाहर घूमने के लिए निकला जाए! बाईसा माताजी जी को कह कर तैयारी करवाई गई! भगवान जी की सवारी के लिए सभी भक्तजन तैयार थे किंतु उनमें से नागदेव जी को घोड़ा बनने के लिए महाराज ने तैयार किया! भगवान जी ने अपने रेशमी वस्त्र को दोनों तरफ से बांध लिया और कमर के पीछे कर राजा की भांति सवार हो गए! सभी के हाथों में लाठी थी! नागदेव जी को भगवान जी ने स्थिति सुख दिया जिसके प्रभाव से वे घोड़े की तरह हिनहिनाते हुए तेज गति से चलने लगे! छिनस्थली गुफा में आकर भगवान जी रुके और भक्तजनों ने अपनी लाठी की मशाल से आरती जलाई! सुंदर पूजा अर्चना कर भगवान जी के लिए आसन बनाया गया! सिंदोले गव्हाण गांव से दूध लाकर भक्तजनों ने भगवान जी को दूध चावल का भोजन करवाया! फिर स्वामी जी ने सभी भक्तों को प्रसाद दिया और वापिस राजमठ लौट आए!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची | उ...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची तब क्या देखती हैं कि यहां का पानी भी अन्य स्थानों की तरह ही है! कोई विशेष नहीं! बहुत पछतावा कर दादोस के कारण दुखी हो रही थी! मन को समझा कर उन्होंने गंगा में स्नान किया! सबसे पहले दादोस को तिलांजलि दी! फिर अपने परिवार और गोत्र को भी तिलांजलि दी! इसके बाद स्नान कर बाजार आई और अत्यंत दुर्बल नंगे व्यक्ति को भोजन करवाया! उस व्यक्ति को अधिक भूख लगी थी तो वह अतिरिक्त दो लोगों का भोजन भी खा गया! उसके जाने के बाद महादाईसा जी रिद्धपुर के लिए निकली!

यहां से भगवान की ने बाईसा माताजी और नागदेव की को भी परमेश्वर पुर भेजा हुआ था! वे श्री गोविंद प्रभु जी के दर्शन कर वापिस श्री चक्रधर स्वामी जी के पास चलपड़े! भगवान से उन्हें माईतया के घर भेंट हुई!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

सबको अपने जैसा जानो

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
नियमानुसार एक दिन आश्रमकी देखभाल आउसा कर रही थी। एक कुत्तेको आया देखकर उसने उसे पत्थर मारा। पत्थर लगते ही कुत्ता चिल्लाता हुआ पूँछ दबाकर बाहरकी ओर भाग गया। कुत्तेका रोना था कि उधर भगवान दोनों हाथोंमें अपना मस्तक थामकर बैठ गये।
भगवानको श्रीमुकुट थामे देख आउसाका रंग उड गया। वह भागकर उनके पास जा पहुँची। उसने अकुलाकर खिन्न मनसे पूछा - 'महाराज! मैंने मारा तो कुत्तेको है, आप कयों मस्तक थामकर बैठ गये हैं ?'
भगवानने समझाया - 'आउसा ! ईश्वरस्वरूप सर्वत्र व्यापक है। किसी जीव पर किये प्रहारका इसीलिये वह अनुभव करता है। तुमने उस प्राणीको पत्थर मारा, उसकी पीड़ा हमें हुई, इसीलिए हमने मस्तक थाम लिया।' फिर उन्होंने कुछ थमकर पूछा - 'बताओ तो तुमने उसे मारा कयों है ?'
आउसाने उत्तर दिया, 'महाराज! कल यही कुत्ता नागदेवके भिक्षान्नकी झोली उठा ले गया था। आज यह पुनः कुछ उठानेकी नीयतसे आया था। यदि मैं इसे न मारती, तो यह अवश्य ही आज भी कुछ ले भागता। अतः मैंने उसे समुचित दंड दिया है , तो कोई अपराध नहीं किया।'
भगवानने कहा, 'आउसा ! मनुष्यके समान इसे पकाकर खिलानेवाला तो कोई है नहीं, जहाँ जाकर यह आरामसे खायेगा। इस बेचारेने तो इसी तरह घूम-फिरकर पेट भरना है। तुम अपनी चीजोंको सम्भालकर रखो, उसके लिए इसे क्यों दंडित करती हो ? यह तो खुद तुम्हारा दोष है। इस तरह वस्तुओंको असुरक्षित रखोगी, तो यह तो मुँह मारेगा ही।'
भगवानके उदात्त विचारोंके आगे आउसा नतमस्तक हो गई और उसने *अपने अपराधकी क्षमा माँगकर पुनः वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा ली।
।। जय श्री चक्रधर जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more