श्री दत्तात्रेय प्रभुंचे १० वेष

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-11-19 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Dattatreya Prabhu, Panch Krishan Avatar
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🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



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ज्ञान परम्परा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?

स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।

सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।

श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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कोणापासुन कोणते शास्ञ निर्माण झाले

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

कोणापासुन कोणते शास्ञ निर्माण झाले ?
(१) परमेश्वराची —ब्रह्मविद्या
(२) मायेचे — चार वेद
(३) विश्वरुपाचे —ञिकांङ वेद
(१) कर्नकांङउपासना
(३) ज्ञानकांङ असे तीन कांङ
(४) अष्टभैरवाने वेदावर अष्टशास्ञ तयार केले
(१) कराळी भैरवाचे —कामशास्ञ
(२) विकराळी भैरवाचे,धर्मशास्ञ
(३) उमापती भैरवाचे, उद्योगशास्ञ
(४) पशुपती भैरवाचे , सांख्यशास्ञ
(५) सदाशिवभैरवाचे, न्यायशास्ञ
(६) ब्रह्मा भैरवाचे—वेदांतशास्ञ
(७) विष्णूभैरवाचे, आगमशास्ञ
(८) महादेवभैरवाचे,निगमशास्ञ
(५) क्षिराब्धिच्यामहाविष्णुपासुन – १४ विद्या
(६) केलासाच्या महादेवापासुन – ६४ कला
(७) वैकुंठीच्या विष्णुचे- मिमासाशास्ञ
(८) ब्रह्नदेवाने -उपनिषद
(९) इंद्राने – कोकशास्ञ
(१०) चिञसेनाची – गायनकला
(११) साबाचे – मंञशास्ञ
(१२) यक्षणीची – कुविद्या
(१३) क्रषीमुनीनी – १८पुराणांची रचना केली
भगवान श्रीचक्रधर स्वामी की जय

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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एक दिन महदाइसा ने श्री चकर्धर स्व...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी जी ने उत्तर दिया, महदाइसा! जब भगवन श्री कृष्ण जी राजा कंस का वध करके कारागर की ओर जाने लगे तो वहा देखा की उद्धव देव भयभीत स्तम्भ के पीछे खड़े थे।
श्री कृष्ण जी ने उन्हें छिपा देख कर कहा, अरे! वहा कूँ खड़ा है। उतर देते हुए अन्य सेवक ने कहा। प्रभु जी वहा पर राजा कंस के प्रधान मंत्री है। तत्काल उद्धव ने कहा, प्रभु जी में अपनी बुद्धि से कुछ मंत्रणा कंस के समुख रखा करता था। तब प्रभु जी ने कहा, आपने आजतक कंस का अमात्यतव सवीकारा था, अब आजसे आप हमारा मंत्रितब धारण करो ओर हमे मंत्रणा दिया करो।
प्रभु जी के इन्ही वचनों के साथ उद्धव देव को प्रेम संक्रमण हुआ ओर उन्होंने प्रभु जी को सहस्तांग दंडवत प्रणाम कर, खुदको धन्य माना|

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

🌸 बिना भाग्य जो वस्तु ईश्वर अवतार देते है वह लिला ज्ञान कहलाता है।
🌸 अवतार के सम्बन्ध से जो फल प्राप्त होता है वह सम्बन्धदान है।
🌸 जोवो के कर्मों को ग्रहण कर उन्हे सीघ्रता से भुगवाने को ग्रहणा दान कहते है।
🌸 ईश्वर स्वरूप की प्राप्ती होना यह कैवल्यदान कहलाता है।

ईस प्रकार ईश्वर की ओर से ये चार प्रकार के दान दिये जाते है।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमान...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
🌸 दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमाने संपुर्ण शरणागती
🌸 दंडवत हा शब्द प्राचीन ग्रंथ रचनेत सुद्धा आला आहे
🌸 दंडवत दोन प्रकारे केल्या जातो ,एक वाचिके कायाप्रणीत कंबरेपासुन वाकुन दंडवत बोलने
🌸 दुसरा दंडवत संपुर्ण शरीर जमीनीवर काठिवत् टाकने
🌸 लीळाचरीत्रात बाईसा राशी दंडवत् घालत होत्या स्वामींच्या दर्शनाला आलेले भक्तजन पाच दंडवत घालुन श्रीचरणी लागत, स्वामी चांगदेव भटाला रिद्दपुरला गेल्यावर घाला घाला दंडवत म्हटले
🌸 आपण सुद्दा स्थानाला गेल्यावर प्रथम बाहेर पाच दंडवत घालुन त्या स्थानाची लीळा आठवावी,नंतर हात सोवळे करुण स्थान वंदन करावे पुनश्च संपुर्ण विधी झाल्यावर दंडवत घालुन मंदिराच्या बाहेर पडावे
🌸 दंडवत घातल्याने जीव स्वरुपी आलेला आसळगै ,पातलेपणा निघुन जातो व साधक विधी करण्यास दक्ष होतो
🌸 दंडवताने रोग नाहिसे होतात ,कारण दंडवत हा एक ऊत्तम व्यायाम आहे,वाय,कफ,पित्त बाधत नाहित
🌸 दंडवत घालताना लीळाचरीत्रातील दंडवताच्या लिळा आठवल्याने जीव स्वरुपाची योग्यता वाढते ईत्यादि अनेक फायदे आहेत
🌸 परमेश्वराच्या सर्व साधकाने एकमेकांना भेटल्यावर वाकुन ,नम्रतेने ,श्रद्धेने आवडिने दंडवत केला तर स्वामी भेटलेयाचे गोमटे होते

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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नृत्य देखना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान श्रीचक्रधर स्वामीजी चांगदेव मंदिरके पिछले हिस्सेमें बैठे थे। उतनेमें एक नर्तक मंडली वहाँ नृत्य करने आ पहुँची। उनमेंसे एक स्त्री वस्त्र बदलने जब मंदिरके पीछे आयी, तो उसने वहाँ भगवानको विराजमान देखा। वह भगवानके असीम सौंदर्यपर मनोमुग्ध हो आत्मविस्मृत-सी हुई निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर टुकुरटुकुर ताकती रही। जब काफी देर बाद भी वह वापस न आयी, तो दूसरे नर्तक भी उसे खोजते खोजते वहाँ जमा हो गये और भगवानके देदीप्यमान सौंदर्यको देख अपनी सुधबुध खो बैठे। उनको अपने पास एकत्रित हुआ देख भगवानने उनसे कहा, 'आप सब अंदर चलकर नृत्यकी तैयारी करो, हम वहीं आते हैं।'
भगवानके इन शब्दोंसे उनकी तंद्रा टूटी, तो उन्होंने अपनेआपको विमोहितसा पाया। उनकी आज्ञानुसार वे सब मंदिर में जाकर नृत्यकी तैयारीमें लग गये। थोड़ी देर बाद भगवान भी मंदिरमें जा पहुँचे। सबने भगवानको अपनीअपनी कला दिखायी। भगवानने सबकी कलाकी भूरिभूरि प्रशंसा की तथा उन्हें प्रसाद रूप में पान खिलाये। जानेसे पूर्व उन्होंने कहा, 'महाराज, आपकी श्रीमुर्तिके दर्शनसे हमें बड़ा आनंद प्राप्त हुआ है। ऐसा आनंद, जिसको हम शब्दोंमें व्यक्त नहीं कर सकते। आजकल तो कलाका कोई सच्चा पारखी है ही नहीं। आपने हमें जो प्रोत्साहन दिया है, उससे भी हमें बड़ा बल मिला है।'
एक दूसरी नर्तकीने आगे बढ़कर प्रार्थना की, 'महाराज, यदि आपको कष्ट न हो, तो भोजन करने आप हमारे यहाँ ही चलें।'
प्रत्युत्तरमें भगवानने कहा, 'हमें आज कहीं अन्यत्र आमंत्रण है, इसलिये तुम्हारे साथ नहीं चल सकते। हाँ, फिर कभी तुम्हारे अनुरोधको हम जरूर पूर्ण करेंगे।'
सबके चले जानेपर भगवान भी अपने निवास स्थानपर लौट आये।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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