ज्ञान शक्ती स्वीकार
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
इधर श्री चक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से (श्री दत्तात्रेय प्रभु) वाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्री चक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्री चक्रपाणी प्रभु श्री दत्तात्रेय प्रभु के (वाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी वाघने (श्री दत्तात्रेय प्रभु) श्री चक्रपाणी के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की, श्री चक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ “पराशक्ती” के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
बेलापुर के आदित्य मंदिर का आँगन। प्रातःकाल का समय। महदाइसा को कुछ घिसने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। उत्सुकता से भर वह बाहर आकर देखती है।
क्या देखती है कि सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी दोनों श्रीचरणों में टिकाए एक पत्थर पर एक काले रंग की ईंट (वज्री) को घिस रहे हैं। अपने उत्तरीय से वे अपना शीर्ष ढंके हुए हैं। अंगिए की बाँहें उन्होंने ऊपर की हुई हैं।
कुतूहल से भर महदाइसा निकट आ खड़ी होती है। चुपचाप। स्वामीजी व्यस्त हैं। उनके मस्तक पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं। सूर्य की किरणें उन पर पड़ रही हैं।
महदाइसा को कुछ समझ नहीं आती कि स्वामीजी क्या कर रहे हैं? वह जाती है और जाकर नागदेव को बुला लाती है।
कुछ घिस जाने पर स्वामीजी उस वज्री को उलटपलट कर देखते हैं। सही हो गई कि नहीं? सही न पा उसे फिर घिसने लगते हैं।
जब महदाइसा-नागदेव को कुछ समझ नहीं पड़ा तो उनसे रहा नहीं गया। महदाइसा ने तन्मयता भंग करते पूछ ही लिया, 'जी जी: यह आप क्या कर रहे हैं?' पीछे मुड़ स्वामीजी बोले, 'बाई, यह हमने एक वज्री गढ़ी है!
वज्री अर्थात् वारितुरंग। जल में तैरनेवाला घोड़ा, जो पानी से घिरे द्वीप में रहता है और उसमें तैर लेता है। डूबता नहीं। उसे वारितुरंग कहते हैं। उसी की तरह हमने अपने हाथों यह वज्री गढ़ी है। यह सदा पानी में तैरती रहेगी। कभी डूबेगी नहीं।
यह कहते स्वामीजी ने वह वज्री सामने करते दोनों को दिखाई
बरसों बाद महदाइसा ने इसी अनुपम लीला का स्मरण करतेकरते नौगाँव में अपने अंतिम श्वास छोड़े।
ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस लीला का नित्य स्मरण जीव को अवश्यमेव इस संसार-सागर से पार करा देता है। जन्ममरण के चक्र से मुक्त करा देता है।
प्रतिदिन प्रातःकाल के स्मरण में इस फलदायक लीला को अवश्य अपने ध्यान में लाएँ।
सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी की सदा ही जय हो!
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreहमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
|| भगवान श्री कृष्ण ||
जन्म स्थान : मथुरा बन्दी गृह (जेल) (उत्तर प्रदेश) में
जन्म का समय : श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी रात्रि १२ बजे (बुधवार)
|| श्री दत्तात्रेय महाराज ||
जन्म स्थान : बद्रिकाश्रम उत्तराखंड (हिमालय)
जन्म का समय : मार्गशीष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी प्रातः ४ बजे (शुक्रवार)
|| श्री चक्रपाणी महाराज ||
जन्म स्थान : फल्टन जिला सातारा (महाराष्ट्र)
जन्म का समय : आशिवन कृष्ण पक्ष नवमी सुबह ५ बजे (वीरवार)
|| श्री गोविन्द प्रभु महाराज ||
जन्म स्थान : काटसुर (रिध्पुर) महाराष्ट्र
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी रात्रि १० बजे (मंगलवार)
|| सर्वज्ञ श्री चक्रधर स्वामी ||
जन्म स्थान : भरोच, (गुजरात)
जन्म का समय : भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीय दोपहर २ बजे (शुक्रवार)
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreसबको अपने जैसा जानो
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
नियमानुसार एक दिन आश्रमकी देखभाल आउसा कर रही थी। एक कुत्तेको आया देखकर उसने उसे पत्थर मारा। पत्थर लगते ही कुत्ता चिल्लाता हुआ पूँछ दबाकर बाहरकी ओर भाग गया। कुत्तेका रोना था कि उधर भगवान दोनों हाथोंमें अपना मस्तक थामकर बैठ गये।
भगवानको श्रीमुकुट थामे देख आउसाका रंग उड गया। वह भागकर उनके पास जा पहुँची। उसने अकुलाकर खिन्न मनसे पूछा - 'महाराज! मैंने मारा तो कुत्तेको है, आप कयों मस्तक थामकर बैठ गये हैं ?'
भगवानने समझाया - 'आउसा ! ईश्वरस्वरूप सर्वत्र व्यापक है। किसी जीव पर किये प्रहारका इसीलिये वह अनुभव करता है। तुमने उस प्राणीको पत्थर मारा, उसकी पीड़ा हमें हुई, इसीलिए हमने मस्तक थाम लिया।' फिर उन्होंने कुछ थमकर पूछा - 'बताओ तो तुमने उसे मारा कयों है ?'
आउसाने उत्तर दिया, 'महाराज! कल यही कुत्ता नागदेवके भिक्षान्नकी झोली उठा ले गया था। आज यह पुनः कुछ उठानेकी नीयतसे आया था। यदि मैं इसे न मारती, तो यह अवश्य ही आज भी कुछ ले भागता। अतः मैंने उसे समुचित दंड दिया है , तो कोई अपराध नहीं किया।'
भगवानने कहा, 'आउसा ! मनुष्यके समान इसे पकाकर खिलानेवाला तो कोई है नहीं, जहाँ जाकर यह आरामसे खायेगा। इस बेचारेने तो इसी तरह घूम-फिरकर पेट भरना है। तुम अपनी चीजोंको सम्भालकर रखो, उसके लिए इसे क्यों दंडित करती हो ? यह तो खुद तुम्हारा दोष है। इस तरह वस्तुओंको असुरक्षित रखोगी, तो यह तो मुँह मारेगा ही।'
भगवानके उदात्त विचारोंके आगे आउसा नतमस्तक हो गई और उसने *अपने अपराधकी क्षमा माँगकर पुनः वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा ली।
।। जय श्री चक्रधर जी ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
भगवान जी विहरण से लौट राजमठ की तरफ आ रहे थे तभी एक विद्यावंत सुंदर वस्त्र पहने और माथे पर तिलक लगाए आगे आने लगे! भगवान जी ने उन्हें देखा और द्वार के पास पहुंच नागदेव जी को आज्ञा दी कि उस विद्यावंत पुरुष को वापिस भेज दिया जाए! नागदेव उनके पास गए और कहने लगे, क्या हो गया है इस टोलगी को? विद्यावंत होकर गा रहे हो? यहां कोई दान करने वाला बैठा है क्या?
फिर वह विधावंत व्यक्ति चला गया! उसकी जाने के बाद भगवान जी ने नागदेव जो को कहा, तुम महात्मा होकर ऐसे अपमान भरे शब्द कैसे बोल गए? उसे आराम से भेजने को कहा था न कि अपशब्द बोलने को! यहां कोई दानी नहीं बैठा क्या? फिर हम कौन हैं? साधक को परमेश्वर की मानसिक प्रवृति को भंग नहीं करनी चाहिए!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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नागूबाई पैठणकर (बाईसा) - परमेश्वराचे प्रेमदानास प्राप्त झालेली परमेश्वर सेवक बाईसा
– गोदावरीच्या काठावर बसलेल्या पैठण शहराची निर्मीती शालिवाहन राजा याने केली
– याच शालीवाहन राजाने मराठी शके सुरू केली …तेव्हापासून शालीवाहन शके असे म्हणतात
– या पैठण नगरी मध्ये थोर संत महंत ज्योतीषी रहात होते
– या शहरात न्याय निवाडा करण्याचे काम चालत असत
– येथील लोक वैदिक कर्मकांडात गुंतलेले होते
– नागूबाई या बालविधवा
– व्रत वैकल्ये करून जीवन व्यतीत करीत होत्या
– त्यांनी शैवपंथाच्या सुमूर्ताबाई यांना गुरू केले व त्यांची पुजा अर्चा करू लागल्या
– त्या कालवश झाल्यावर त्यांच्या जागेवर नागूबाई बसल्या व शीष्यांकरवी स्वतःची पुजा अर्चा करू लागल्या
– स्वामी त्र्यंबकेश्वरला जाण्यासाठी निघाले असता पैठणला आले
– बाजारामध्येच स्वामींची भेट झाली
– नागूबाई यांनी स्वामींना आपल्या सोबत गुंफेमध्ये आणले
– बसायला पाय पुसणी आणी भोपळ्याच्या करंटीमध्ये पाणीभात (पाण्यात भीजवलेले वाळलेल्या भाकरीचे तुकडे) दिला
– दोन दिवसांचा स्वामींचा क्रम असा असे… नागूबाई यांच्याकडे जेवण आणी भोगनारायण मंदिरात निद्रा
– नागूबाई स्वामींना बसायला पायपुसणी देत वा स्वतः उच्च आसनावर बसून भक्तांच्या कडून स्वतःची पुजा अर्चा करीत असत
– तिसऱ्या दिवशी नागूबाई यांची पुजा सुरू असताना त्यांची व स्वामींची नजरानजर झाली. क्रूपाद्रूष्टिने जीव ईश्वर भाव उमटविला
– श्रेष्ठत्व, वयोवृद्धत्व, तपोवृद्धत्व हे तिन दोष नाहिसे केले
– नागूबाई यांचे अंतःकरण पोळले. त्यांनी स्वामींना उच्च आसनावर बसवून पुजा अर्चा केली
– त्यांनी शेवट पर्यंत स्वामींची त्रीकाळ (सकाळ, दुपार , संध्याकाळ ) पुजा अर्चा केली
– मंगल आरतीची सुरवात त्या अशा पध्दतीने करत - जयतु मंगल मंगला परम मंगलरूपा
– पुजा करीत असताना त्यांना अष्ट भाव प्रकटे… थर थर कापणे, रोमांच उभे रहाणे, अश्रूधारा, स्वर भंग, रंग पालटे, ताठपणा येई, घाम सुटे, स्तब्धता येई…. मग स्वामी म्हणत… बाईसांच्या हातातील पालमांडे घ्या
– बाईसा असे नामकरण स्वामींच्या सन्निधानी आल्यावर झाले
– स्वामींना गरम पाणी देणे, आरोगणा (जेवण), व्याळी (रात्रीचे जेवण), स्वामींकरीता आसन टाकणे, रात्री शयनासन टाकणे इ. नित्य सेवा त्या करीत
– भक्तजनांवर माते सारखे प्रेम त्या करीत… स्वामींनी कुणाला शीक्षा केल्यास त्या मध्यस्थी करत
– सर्व भक्त जण बाईसांना विचारूनच स्वामींना उपहार वगैरे करीत
– जैसे मासे पाण्या शीवाय राहू शकत नाहीत तसे बाईसा आमच्याशीवाय राहू शकत नाहीत. .. असे स्वामी म्हणत
– या थोर माऊलीने स्वामींच्या वियोगाने बोटीतून उडी टाकून देहत्याग केला
सदर माहिती संग्रहावरून उपलब्ध झालेली आहे, काही चुकीचे असलेल्या गोष्टी बदल माफ करावी
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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