स्वामींचा परिवार

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-11-26 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1701001800

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

कामाख्या के निमित्त देह त्यागना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रपाणि प्रभु जी
कौलि नामक ग्राम में एक हट योगिनी रहा करती थी जिसका नाम था कामाख्या, उसने अपने सौन्दर्य तथा अपने हाव् भाव से अनेक साधु संतो को अपने तप मार्ग से प्रवृत्त किया था। श्री चक्रपाणि महाराज जी के सामर्थ की परिस्थिति सुन बह भी वह आ पहुंची। अपने रंग रूप और हाव् भाव से वो प्रभु जी पर डोरे डालने लगी। श्री चक्रपाणि महाराज जी ने ब्रह्मचर्य धारण किआ था और प्रभु जी अपनी गुफा में ही ध्यान लगाए बैठे थे। कामाख्या गुफा में प्रवेश करना चाहती थी परन्तु बह प्रभु जी द्वारा श्री दत्तात्रय प्रभु जी की दी हुई कसम के कारन अंदर ना जा सकी।
कामाख्या गुफा के भर से ही अनेक प्रकार की स्तुति और प्राथना करती रही और अपने हाव् भाव से कोशिश करती रही परन्तु कोई भी प्रभु जी असर न पड़ा और बह अपने मार्ग से हुए। इसी प्रकार ७ दिन बिट गए और कामाख्या गुफा के दरवार में बैठी रही। अंत में श्री चक्रपाणि जी ने योग सामर्थ्य से अपना देह त्याग दिया। सातवे दिन कामाख्या ने गुफा में प्रवेश किआ तो देखा की प्रभु जी अपना शरीर छोड़ चुके थे। प्रभु जी की प्रसंशा करते हुए उसने खा की अनेक प्रकार के महा पुरषो को अपने वश करा मेने किन्तु प्रभु जी सामर्थ्यवान थे अंत अपने शरीर का त्याग किया।
।। जय श्री चक्रपाणि महाराज जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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स्वामींचा परिवार

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
स्वामींचा परिवार तीन प्रकार चा होता:
१) दर्शनीय।
२) बोधवंत (ग्यानी पुरूष तथा भक्त)।
३) अनुसरलेला एकून स्वामीचा परिवार १३५ होता। तो येणे प्रमाणे।

भक्त:
१) पैठनची नागुबाई उर्फ बाईसा
२) वरंगलचे माघव भक्त ब्राह्मण।

बोधवंत (ग्यानी पुरूष):
१) श्री नागदेवाचार्य २) शांतबाईसा ३) महादाईसा ४) म्हाइंभट ५) दायंबा
६) देमाईसा ७) छर्दोबा ८) खेईगोई ९) गोईबाई १०) जोनोउपाध्ये
११) नीळभट भांडारेकार १२) नाथोबा १३) चांगदेव भट

अनुसरलेली:
१) भट (नागदेवाचार्य) २) नीळभट ३) शांताबाईसा ४) महादाईसा ५) म्हाइंभट
६) साधा ७) आऊसा ८) आबाईसा ९) नाथोबा १०) पोमाईसा
११) खेईबाईसा १२) गोईबाईसा

दर्शनीय:
१) रामदेव विद्यावंत वडनेतर २) सारंग पंडित ३) इंद्रभट ४) संतोष ५)अवडळभट
६) अवघूत ७) मार्तंड ८) परसनायक ९)प्रद्न्यासागर १०) माइताहरी
११)घुईनायक १२) रेनाईक १३) गदोनायक १४) पद्मनाभी १५) नागदेव उपाध्ये
१६)राके लक्छमींद्रभट १७) काकोस १८)आनो १९) खळो २०) गोंदो
२१) जपिय विष्णुभट २२) भ्रिंगी २३) वैजोबा २४) काळदासभट २५)वामन
२६) मतिविळासभट २७) नागनायक (डोमेग्राम) २८) भाईदेव २९) उपासनीये ३०) काळबोटे
३१) साईदेव ३२) कान्हो उपाध्ये ३३) काळेवासनायक ३४) गोरे जानोपाध्ये ३५) एकाईसे दोन
३६) देमाईसा ३७) लखुबाईसा ३८) सोभागा ३९) यल्हाइसा ४०) भूतानंद
४१) सामकोसे ४२) ललीताइसा ४३) एकाविराबाईसा ४४) द्रविळाबाईसा ४५) रत्नमाणिका
४६) आबयो ४७) माळी (वडेगाव) ४८) कमळनायक ४९) राणाइसा (रामदेव विद्यावंताची माता) ५०) तथा रामदेवाची शिष्या राणाइसा
५१) वामदेव पैठणकर ५२) बोनुबाया ५३) मेहकरकर बोनु बाइया ५४) प्रंपच विस्मृति घाटे हरिभट ५५) तिवाडी
५६) तथा त्याची पत्नी ५७) ग्रह सारंगपाणी ५८) तथा त्याची माता ५९) महादेव पाठक ६०) महादेव रावसगावकर
६१) तिकवनायक हिरवळीकर ६२) वायनायक रावसगावकर ६३) राहिया (पाटोदा) ६४) गोविंदस्वामी ६५) सारस्वत भट बीडकर
६६) कनासीचा ब्राह्मण ६७) सिंदुर्जनाचा ब्राह्मण ६८) मोसोपवासिनी ६९) राघवदेव ७०) कुंडी कनहरदेव
७१) महादेवोराजा ७२) पाल्हाडांगिया ७३) कास्त हरिदेव पंडित ७४) गोपाळ पंडित पारधी निरोपनीचे ७५) साळीवाहन
७६) राऊत दोघे ७७) मातंग ७८) देईभट तांबुळ ग्रहनीचे ७९) भोग नारायण माय धुवा ८०) मायधुवा
८१) दाको ८२) गणपत आपयो सराळेकर ८३) सुयराची बाई ८४) गोवारीया ८५) पंचगंगा ब्राह्मण
८६) सुकिये जोगनायक ८७) पाठक ८८) यंत्राकार वासुनायक ८९) भाऊ तिकवनायक ९०) गुर्जर दोन्ही
९१) नागा राऊळ ९२) मुंजिया बहिनी ९३) छायागोपाळीची स्त्री ९४)मार्तंड विहिरीचा ब्राह्मण ९५) पाठक देगाऊबाई
९६) वरंगलकर हंसाबाई ९७) घोगरगावकर बाई ९८) धानाई अळजपुर ९९) रामदरणेयाची माता १००) मुक्ताबीई
१०१) रोहेरीचा ब्राह्मण १०२) भोगनारायण ब्राह्मण १०३) ठाकूर मार्या १०४) मल्ल (जोगवटा दान देणारा) १०५) स्वामींनी ज्याला जोगवटा दिला तो ब्राह्मण
१०६) नारोबा १०७) नांदेड येथील गोरक्छण ब्राह्मण १०८) हेडाऊ (आऊसा जवळील डांगरेस नावाचा कुत्रा स्वामींचा भक्त होता)
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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श्री गोविन्द प्रभु महाराज जी के द...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

गोविन्द प्रभु भगवान जी के अवतारोत्सव पर हम जितने पदार्थ बनने में सक्षम है उतने पदार्थ बना का प्रभु जी को को भोग लगाना चाहिए।
1 - लाख की भाकर, गुड़ की रोटियां, दलिया
2 - दही दूध और माखन, श्री खंड, गुलाब जामुन
3- पकोड़े (बुड़ुदे), धिडरे (बेसन से बना हुआ पुडा), काजू
4 - गुड़, गुड़ और भुने चने, कच्चे ज्वार के दाने
5 - देसी घी, मक्खन, गुड़ और देसी घी से बनी सेवइयां
6 - मीठी ककड़ी, दही भल्ले, खीर
7 - बैंगन की सब्जी, साग
8 - तरबूज, बेर, संतरे, आम का रस
9 - आउसा जी का प्रसिद्ध हलवा

इत्यादि पदार्थ भगवान जी को अच्छे लगते थे।

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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म्हाइंमभट्ट जी का अहंभाव दूर करना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री गोविंद प्रभु राया
एकदिन म्हाइंभट्ट जी ने सर्वज्ञ श्री गोविंद प्रभु जी के लिए अच्छा उपहार तैयार करवाया। तैल मर्दन, स्नानादि क्रियाके पश्चात श्रीप्रभु सर्वज्ञ को बहुमूल्य वस्त्र पहनाया गया। प्रसन्नतावश उस किमती बहुमूल्य वस्त्रको पहने सर्वज्ञ आनंदसे आगनमें इधर-उधर घुम रहे थे, तो सर्वज्ञ श्रीगोविंदप्रभुबाबाकी प्रसन्नता देखकर *म्हाइंमभट्टजीको अहंभाव जागृत हो उठा की यह मैं ही म्हाइंमभट्ट हूं, जीसका इतना बहुमूल्य किमती वस्त्र श्रीप्रभुबाबा स्वीकार कर रहे है !!! घट घटके जाननहार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे भला म्हाइंमभट्टके मनमें जागृत हुई इस अहंभावना कैसे छुपी रह सकती। उसे जान तत्काल उस वस्त्र उतार सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबाने दूसरा वस्त्र पहन लिया, और उस वस्त्र पर पाद प्रहार कर बोले- अरे पगले व्यर्थमें ही इसकी बड़ाई कर रहा है! इसे अभी हम फाड देंगे!' कहकर उस वस्त्रको इधर-उधर घसीटने लगे। उस समय श्रीसर्वज्ञके सन्मुख जानेकी कीसी को हिम्मत नहीं हो रही थी जिससे उन्हें विनंतीकी जाय।

तब श्रीआचार्यजीने म्हाइंमभट्ट जी से पूछा, ' म्हाइंमभट्ट! क्या तुमने मनमें कोई कल्पना तो नहीं की ?' उत्तरमें म्हाइंमभट्टजी बोले, 'हां ! आचार्य! मैंने वस्त्र के संबंधमें कल्पना कर संतोष अनुभव कर रहा था।

आचार्यजी समझाते हुए बोले, 'भट्टजी, हम जीवोंके पास है ही क्या, जो हम परमेश्वरको समर्पित कर सकें? तुमने किया ही क्या था? की मनमें इतना संतोष मान बैठे? अब सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते नमस्कार डालीये !!!!!।

तब म्हाइंमभट्टजीने साष्टांग नमस्कार डालते आर्तभरे स्वरमें सर्वज्ञ श्रीप्रभुबाबासे क्षमा माँगते प्रार्थना करते विनंती की- 'हे भगवन् मैं अपराधी हूं, मैंने अहंभाववश मनमें व्यर्थकी कल्पना की थी, मेरे इस अपराधके लिए मुझे क्षमा किजीये श्रीप्रभु राया। आपके सम्मुख वह वस्त्र है ही क्या? किंतु! अज्ञानतावश मैं यह जान ही न सका। मेरी यह अबुधताके लिए मुझे क्षमा किजिए !!!!!' यह कहकर वे रो पडे तो करुणाधन सर्वज्ञ श्रीप्रभु राया का दिल पसीज उठा। प्रसन्न होकर श्रीराया बोले,' अरे पगले! उठ जा ! उठ जा, जल्दी, क्यों नहीं उठ रहा ! पगले! अब तो तुम मेरे और भी अधिक प्रिय बन गये हो!

म्हाइंमभट्टजी उठकर वह वस्त्र ले आये तो सर्वज्ञ श्रीप्रभुरायाने उसको पुनः पहन लिया। कुछ दिनोंतक श्रीप्रभुबाबाके पहननेके पश्चात म्हाइंमभट्टजीने उस वस्त्र को धोनेके लिए दे दिया। उसके पश्चात सर्वज्ञ श्रीप्रभुराया उस वस्त्रको प्रतिदिन पहनते ही रहे।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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लाहीभट्टकी श्रवणजिज्ञासा

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन लाहीभट्ट श्रीचक्रधर स्वामीजीके दर्शनोंको आया। प्रणाम करनेके उपरांत उसने भगवानसे कुछ सुननेकी प्रार्थना की। भगवान बोले, ' लाहीभट्ट, अपने मनमें धारण किये देवताविषयक सकाम कर्मोंको भुला देनेपर ही तुम हमारे उपदेशके वास्तविक अधिकारी बन सकते हो। उनके रहते ईश्वरीय ज्ञानकी प्राप्ति दुर्लभ है।'
लाहीभट्ट बोला, 'महाराज! देवताभक्त ईश्वरीय ज्ञानको धारण क्यों नही कर सकता ? उसमें भी तो कर्मकांड पर अटूट श्रद्धा रहती है।'
भगवानने समझाते हुए कहा, 'भट्ट! कोरा कर्मकांड मुक्ति नहीं दिला सकता। उससे तो केवल देवताओंके सुखफल ही प्राप्त हो सकते हैं। ईश्वरीय ज्ञानके लिये तो मनुष्यको एकनिष्ठ होना परम आवश्यक है ; क्योंकि जैसे एक मनुष्यके ठहरने पर उस स्थान पर दूसरा मनुष्य नहीं ठहर सकता, वैसे ही देवताविषयक अथवा सांसारिक कामनाओंसे ठसाठस भरे हुए हृदयमें ईश्वरीय ज्ञान चिरंतन कालतक ठहर नहीं सकता।'
सूत्र : वि. बाइः बिढारावरि काइ बिढारु असे ।।२६४ ।।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
जय चक्रपाणि महाराज जी

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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सबको अपने जैसा जानो

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
नियमानुसार एक दिन आश्रमकी देखभाल आउसा कर रही थी। एक कुत्तेको आया देखकर उसने उसे पत्थर मारा। पत्थर लगते ही कुत्ता चिल्लाता हुआ पूँछ दबाकर बाहरकी ओर भाग गया। कुत्तेका रोना था कि उधर भगवान दोनों हाथोंमें अपना मस्तक थामकर बैठ गये।
भगवानको श्रीमुकुट थामे देख आउसाका रंग उड गया। वह भागकर उनके पास जा पहुँची। उसने अकुलाकर खिन्न मनसे पूछा - 'महाराज! मैंने मारा तो कुत्तेको है, आप कयों मस्तक थामकर बैठ गये हैं ?'
भगवानने समझाया - 'आउसा ! ईश्वरस्वरूप सर्वत्र व्यापक है। किसी जीव पर किये प्रहारका इसीलिये वह अनुभव करता है। तुमने उस प्राणीको पत्थर मारा, उसकी पीड़ा हमें हुई, इसीलिए हमने मस्तक थाम लिया।' फिर उन्होंने कुछ थमकर पूछा - 'बताओ तो तुमने उसे मारा कयों है ?'
आउसाने उत्तर दिया, 'महाराज! कल यही कुत्ता नागदेवके भिक्षान्नकी झोली उठा ले गया था। आज यह पुनः कुछ उठानेकी नीयतसे आया था। यदि मैं इसे न मारती, तो यह अवश्य ही आज भी कुछ ले भागता। अतः मैंने उसे समुचित दंड दिया है , तो कोई अपराध नहीं किया।'
भगवानने कहा, 'आउसा ! मनुष्यके समान इसे पकाकर खिलानेवाला तो कोई है नहीं, जहाँ जाकर यह आरामसे खायेगा। इस बेचारेने तो इसी तरह घूम-फिरकर पेट भरना है। तुम अपनी चीजोंको सम्भालकर रखो, उसके लिए इसे क्यों दंडित करती हो ? यह तो खुद तुम्हारा दोष है। इस तरह वस्तुओंको असुरक्षित रखोगी, तो यह तो मुँह मारेगा ही।'
भगवानके उदात्त विचारोंके आगे आउसा नतमस्तक हो गई और उसने *अपने अपराधकी क्षमा माँगकर पुनः वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा ली।
।। जय श्री चक्रधर जी ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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