हमारे पांचो अवतारों का जन्म स्थान तथा जन्म समय

  • Author: Dandvat
  • Posted on: 2023-09-03 18:00:00
  • Tags: Leela, Shree Krishna Prabhu, Shree Dattatreya Prabhu, Shree Chakrapani Prabhu, Shree Govind Prabhu, Shree Chakrdhar Swami, Panch Krishan Avatar
  • Post ID: 1693744200

🙏 दंडवत प्रणाम
नमो पंच कृष्ण अवतार



💌 Leelas

नमो पंच कृष्ण अवतार - Read the leelas of Mahanubhava Pantha. Go to Leelas

सिंह नारायण मंदिर के दक्षिणी भाग ...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
अगले दिन जब भगवान जी पूजा अवसर हो जाने के बाद विहरण के लिए छिन्नस्थली गए तो वहां सिंह नारायण मंदिर के दक्षिणी भाग में पीपल वृक्ष के नीचे आसनस्थ हुए! कुछ समय हो जाने के बाद बाईसा माताजी ने भोजन के लिए आवाज लगाई तो स्वामी जो ने कहा, बाई यह पेट कुछ मांग नहीं रहा है!

इतने में मार्तंड को कहा कि मंदिर की छत पर चढ़कर दूर से आ रहे व्यक्तियों के विषय में बताएं! मार्तंड ने देखा कि इन्द्रभट्ट अपने सिर पर बहुत बड़ा टोकरा रखे बढ़ रहे हैं और साथ में द्वारावती से आए ब्रह्मचारिदेव नाम का ब्राह्मण भी है! भगवान जी की आज्ञा पाकर मार्तंड दौड़ते हुए इन्द्रभट्ट के सिर से टकरा उतारने लगे और स्वयं भोजन उठा कर ले आए! उस दिन इन्द्रभट्ट के घर श्राद्ध था! इनका विश्वास था कि भगवान जी के प्रति भोजन समर्पित करने से सब चरितार्थ हो जाता है! यहां ही सभी तीर्थ स्थान हैं! भगवान जी ने भी उनके भाग्य की बढ़ाई की!

बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

कोणापासुन कोणते शास्ञ निर्माण झाले

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

कोणापासुन कोणते शास्ञ निर्माण झाले ?
(१) परमेश्वराची —ब्रह्मविद्या
(२) मायेचे — चार वेद
(३) विश्वरुपाचे —ञिकांङ वेद
(१) कर्नकांङउपासना
(३) ज्ञानकांङ असे तीन कांङ
(४) अष्टभैरवाने वेदावर अष्टशास्ञ तयार केले
(१) कराळी भैरवाचे —कामशास्ञ
(२) विकराळी भैरवाचे,धर्मशास्ञ
(३) उमापती भैरवाचे, उद्योगशास्ञ
(४) पशुपती भैरवाचे , सांख्यशास्ञ
(५) सदाशिवभैरवाचे, न्यायशास्ञ
(६) ब्रह्मा भैरवाचे—वेदांतशास्ञ
(७) विष्णूभैरवाचे, आगमशास्ञ
(८) महादेवभैरवाचे,निगमशास्ञ
(५) क्षिराब्धिच्यामहाविष्णुपासुन – १४ विद्या
(६) केलासाच्या महादेवापासुन – ६४ कला
(७) वैकुंठीच्या विष्णुचे- मिमासाशास्ञ
(८) ब्रह्नदेवाने -उपनिषद
(९) इंद्राने – कोकशास्ञ
(१०) चिञसेनाची – गायनकला
(११) साबाचे – मंञशास्ञ
(१२) यक्षणीची – कुविद्या
(१३) क्रषीमुनीनी – १८पुराणांची रचना केली
भगवान श्रीचक्रधर स्वामी की जय

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
Read more

पञ्च कृष्ण अवतारों के स्मरण के बा...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

चक्रधर स्वामीजी ने कहा इसी प्रकार पञ्च कृष्ण अवतारों के स्मरण के बाद अपने अपने गुरु निमित की भी याद करनी चाहिए
# वेध गुरु,
# उपदेश गुरु,
# बोध गुरु,
# शाश्त्र उद्देश्य गुरु,
# दीक्षा देत गुरु,
एव अनेक प्रकार के गुरु निमितों को याद करना चाहिए और दंडवत डालनी चाहिए।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

ज्ञान शक्ती स्वीकार

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

इधर श्री चक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से (श्री दत्तात्रेय प्रभु) वाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्री चक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्री चक्रपाणी प्रभु श्री दत्तात्रेय प्रभु के (वाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी वाघने (श्री दत्तात्रेय प्रभु) श्री चक्रपाणी के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की, श्री चक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ “पराशक्ती” के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more

परमेश्वराचे प्रेमदानास प्राप्त झा...

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

नागूबाई पैठणकर (बाईसा) - परमेश्वराचे प्रेमदानास प्राप्त झालेली परमेश्वर सेवक बाईसा
– गोदावरीच्या काठावर बसलेल्या पैठण शहराची निर्मीती शालिवाहन राजा याने केली
– याच शालीवाहन राजाने मराठी शके सुरू केली …तेव्हापासून शालीवाहन शके असे म्हणतात
– या पैठण नगरी मध्ये थोर संत महंत ज्योतीषी रहात होते
– या शहरात न्याय निवाडा करण्याचे काम चालत असत
– येथील लोक वैदिक कर्मकांडात गुंतलेले होते
– नागूबाई या बालविधवा
– व्रत वैकल्ये करून जीवन व्यतीत करीत होत्या
– त्यांनी शैवपंथाच्या सुमूर्ताबाई यांना गुरू केले व त्यांची पुजा अर्चा करू लागल्या
– त्या कालवश झाल्यावर त्यांच्या जागेवर नागूबाई बसल्या व शीष्यांकरवी स्वतःची पुजा अर्चा करू लागल्या
– स्वामी त्र्यंबकेश्वरला जाण्यासाठी निघाले असता पैठणला आले
– बाजारामध्येच स्वामींची भेट झाली
– नागूबाई यांनी स्वामींना आपल्या सोबत गुंफेमध्ये आणले
– बसायला पाय पुसणी आणी भोपळ्याच्या करंटीमध्ये पाणीभात (पाण्यात भीजवलेले वाळलेल्या भाकरीचे तुकडे) दिला
– दोन दिवसांचा स्वामींचा क्रम असा असे… नागूबाई यांच्याकडे जेवण आणी भोगनारायण मंदिरात निद्रा
– नागूबाई स्वामींना बसायला पायपुसणी देत वा स्वतः उच्च आसनावर बसून भक्तांच्या कडून स्वतःची पुजा अर्चा करीत असत
– तिसऱ्या दिवशी नागूबाई यांची पुजा सुरू असताना त्यांची व स्वामींची नजरानजर झाली. क्रूपाद्रूष्टिने जीव ईश्वर भाव उमटविला
– श्रेष्ठत्व, वयोवृद्धत्व, तपोवृद्धत्व हे तिन दोष नाहिसे केले
– नागूबाई यांचे अंतःकरण पोळले. त्यांनी स्वामींना उच्च आसनावर बसवून पुजा अर्चा केली
– त्यांनी शेवट पर्यंत स्वामींची त्रीकाळ (सकाळ, दुपार , संध्याकाळ ) पुजा अर्चा केली
– मंगल आरतीची सुरवात त्या अशा पध्दतीने करत - जयतु मंगल मंगला परम मंगलरूपा
– पुजा करीत असताना त्यांना अष्ट भाव प्रकटे… थर थर कापणे, रोमांच उभे रहाणे, अश्रूधारा, स्वर भंग, रंग पालटे, ताठपणा येई, घाम सुटे, स्तब्धता येई…. मग स्वामी म्हणत… बाईसांच्या हातातील पालमांडे घ्या
– बाईसा असे नामकरण स्वामींच्या सन्निधानी आल्यावर झाले
– स्वामींना गरम पाणी देणे, आरोगणा (जेवण), व्याळी (रात्रीचे जेवण), स्वामींकरीता आसन टाकणे, रात्री शयनासन टाकणे इ. नित्य सेवा त्या करीत
– भक्तजनांवर माते सारखे प्रेम त्या करीत… स्वामींनी कुणाला शीक्षा केल्यास त्या मध्यस्थी करत
– सर्व भक्त जण बाईसांना विचारूनच स्वामींना उपहार वगैरे करीत
– जैसे मासे पाण्या शीवाय राहू शकत नाहीत तसे बाईसा आमच्याशीवाय राहू शकत नाहीत. .. असे स्वामी म्हणत
– या थोर माऊलीने स्वामींच्या वियोगाने बोटीतून उडी टाकून देहत्याग केला
सदर माहिती संग्रहावरून उपलब्ध झालेली आहे, काही चुकीचे असलेल्या गोष्टी बदल माफ करावी

🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
Read more

नृत्य देखना

🙏 दंडवत प्रणाम 🙏

जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान श्रीचक्रधर स्वामीजी चांगदेव मंदिरके पिछले हिस्सेमें बैठे थे। उतनेमें एक नर्तक मंडली वहाँ नृत्य करने आ पहुँची। उनमेंसे एक स्त्री वस्त्र बदलने जब मंदिरके पीछे आयी, तो उसने वहाँ भगवानको विराजमान देखा। वह भगवानके असीम सौंदर्यपर मनोमुग्ध हो आत्मविस्मृत-सी हुई निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर टुकुरटुकुर ताकती रही। जब काफी देर बाद भी वह वापस न आयी, तो दूसरे नर्तक भी उसे खोजते खोजते वहाँ जमा हो गये और भगवानके देदीप्यमान सौंदर्यको देख अपनी सुधबुध खो बैठे। उनको अपने पास एकत्रित हुआ देख भगवानने उनसे कहा, 'आप सब अंदर चलकर नृत्यकी तैयारी करो, हम वहीं आते हैं।'
भगवानके इन शब्दोंसे उनकी तंद्रा टूटी, तो उन्होंने अपनेआपको विमोहितसा पाया। उनकी आज्ञानुसार वे सब मंदिर में जाकर नृत्यकी तैयारीमें लग गये। थोड़ी देर बाद भगवान भी मंदिरमें जा पहुँचे। सबने भगवानको अपनीअपनी कला दिखायी। भगवानने सबकी कलाकी भूरिभूरि प्रशंसा की तथा उन्हें प्रसाद रूप में पान खिलाये। जानेसे पूर्व उन्होंने कहा, 'महाराज, आपकी श्रीमुर्तिके दर्शनसे हमें बड़ा आनंद प्राप्त हुआ है। ऐसा आनंद, जिसको हम शब्दोंमें व्यक्त नहीं कर सकते। आजकल तो कलाका कोई सच्चा पारखी है ही नहीं। आपने हमें जो प्रोत्साहन दिया है, उससे भी हमें बड़ा बल मिला है।'
एक दूसरी नर्तकीने आगे बढ़कर प्रार्थना की, 'महाराज, यदि आपको कष्ट न हो, तो भोजन करने आप हमारे यहाँ ही चलें।'
प्रत्युत्तरमें भगवानने कहा, 'हमें आज कहीं अन्यत्र आमंत्रण है, इसलिये तुम्हारे साथ नहीं चल सकते। हाँ, फिर कभी तुम्हारे अनुरोधको हम जरूर पूर्ण करेंगे।'
सबके चले जानेपर भगवान भी अपने निवास स्थानपर लौट आये।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।

🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read more